(Suryanshtimes balaghat)मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा, बालाघाट के द्वारा सिलसिला एवं तलाशे जौहर के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन 22 नवम्बर 2025 को जटाशंकर त्रिवेदी महाविद्यालय, बालाघाट में ज़िला समन्वयक अशोक सिंहासने के सहयोग से किया गया।






बालाघाट में आयोजित सिलसिला के लिए मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने अपने संदेश में कहा कि मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा ज़िला बालाघाट में आयोजित ‘सिलसिला, कार्यक्रम उर्दू साहित्य की रवायतों को समझने, उन्हें आगे बढ़ाने और वहाँ के साहित्यकारों एवं शायरों को मंच प्रदान करने का एक सार्थक प्रयास है। उम्मीद है कि इस कार्यक्रम से बालाघाट और आसपास के क्षेत्रों में उर्दू साहित्य के प्रति रुचि और अधिक गहराई से विकसित होगी।
बालाघाट ज़िले के समन्वयक अशोक सिंहासने ने बताया कि सिलसिला के तहत दोपहर 2:30 बजे व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता बालाघाट के वरिष्ठ शायर डॉ सतीश चिले ने की। वहीं मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. अशोक मराठे एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में ज़ुल्फ़िक़ार अली सैफ़ी, शील दुबे एवं अलका चौधरी मंच पर उपस्थित रहे।इस अवसर पर बालाघाट के वरिष्ठ शायर जिब्राइल क़ुरैशी शादाब ने अपने वक्तव्य में शायरी की बारीकियों पर चर्चा भी की। रचना पाठ में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उनके नाम और अशआर निम्न हैं :
वो तो दुश्मन से मिरे मिलता रहा
मैंने टोका तो मुझसे ख़फ़ा हो गया।
ज़ुल्फ़िक़ार अली सैफ़ी
तोड़कर हदों को वो जानवर बना कैसे,
जो शुमार होता था कल तलक फरिश्तों में
कृष्ण कुमार मिश्रा ‘सुबोध ‘
प्यार,उल्फ़त ,मोहब्बत रहे दोस्तों
ता-क़यामत ये चाहत रहे दोस्तों
हम रहें ना रहें ये अलग बात है
देश अपना सलामत रहे दोस्तों
साजिद ख़ैरो
लूँ झपक मैं पलक छिल न जाए डगर
आंख पथरा गई तकते तकते सजन
अजय कुमार जैन
वक़्त का इम्तिहान है देखो।
चिड़चिड़ा आसमान है देखो
कृष्ण कुमार भालाधरे
वो मिरे कच्चे घरौंदे मुझे वापस कर दे,
वो हवादार दरीचे मुझे वापस कर दे l
खूब रो रोके सदा दी है शजर ने इक दिन,
मेरे साये वो परिंदे मुझे वापस कर दे l
डॉ. किशोर सोनवाने ‘अनीस’
ज़िन्दगी बे रंग हो जाए मगर
पर दिलों में फाग होना चाहिए।
अशोक सिंहासने
क़लमकार हूँ मैं यही काम मेरा
कि रोते हुए को हँसाने लिखूंगा
-किशोर छिपेश्वर “सागर”
धड़कनों का है अपना बयां ज़िंदगी
रह के उलझन में भी है रवां ज़िंदगी
बात दिल में जो थी कहते कहते रही
दर्द रखना पड़ा यूँ निहां ज़िंदगी
–प्रीति बरखा कांबले
अपने हाथों को उठा रब से दुआ हो जाए
जिंदगी से ग़मों का वक़्त हवा हो जाये l
अल्का चौधरी
कार्यक्रम का संचालन जिब्राईल क़ुरैशी द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत में ज़िला समन्वयक अशोक सिंहासने ने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
अशोक सिंहांसने “असीम”
जिला समन्वयक
सादर प्रकाशनार्थ
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