Post navigation बालाघाट के कान्हा में बाघों की मौत , कई सवाल जवाब गायब न्यूज(suryanshtimes बालाघाट)जिले में विगत सालों में लगातार कई बाघों की मौतों ने प्रशासन के साथ वन्य जीव प्रेमियों को झकझोर दिया है । आखिर बाघ प्रदेश के नाम से पहचाने जाने वाला प्रदेश ओर विशेषकर बालाघाट जिले में इतने बाघों की मौत कैसे और क्यों हो रही है । सवाल तो कई प्रकार के हो रहे है सुरक्षा के दावे भी हो रहे है लेकिन क्या ऐसा जमीनी तौर पर हो रहा है लेकिन वास्तविकता से जवाब गायब है ।सबसे प्रमुख होता है जिला में टेरिटोरियल फाइट यानी क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई भी बाघों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। जंगल में जगह सीमित होने पर बाघों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है। खनन और सड़क परियोजनाओं से बढ़ता दबाव, वन्यजीवों के भविष्य पर बड़ा सवाल भी पैदा करता हैबालाघाट खनिज संपदा से समृद्ध जिला है। जिले में पहले से ही विभिन्न क्षेत्रों में खनन गतिविधियां संचालित होती रही हैं। इसके साथ सड़क निर्माण और भारी वाहनों की आवाजाही भी वन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा सकती है। खनन का प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता जहां खुदाई होती है। खनन से जुड़ी सड़कें, परिवहन, ध्वनि प्रदूषण और मानवीय गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकती हैं।यदि जंगल के बड़े हिस्से आपस में कट जाते हैं तो वन्यजीवों के आवागमन के रास्ते बाधित हो सकते हैं। इसका सीधा असर बाघों और तेंदुओं जैसे बड़े मांसाहारी वन्यजीवों पर पड़ सकता है।बालाघाट में प्रस्तावित या संचालित खनन गतिविधियों को लेकर पर्यावरणीय प्रभावों की वैज्ञानिक समीक्षा इसलिए बेहद जरूरी है। किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले यह देखना आवश्यक है कि उसका असर वन्यजीवों के आवास, कॉरिडोर और स्थानीय जैव विविधता पर कितना पड़ेगा।क्योंकि अगर जंगल का रास्ता बंद हुआ, तो बाघ रास्ता बदलेंगे—और वह रास्ता खेतों या गांवों से होकर भी गुजर सकता है।बाघ बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या सरकार के पास ‘फ्यूचर प्लान’ है?टाइगर स्टेट का तमगा सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाने से कायम नहीं रहेगा। असली चुनौती अब इन बाघों के लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त टेरिटरी और निर्बाध वन्यजीव कॉरिडोर बचाने की है।वन विभाग के सामने अब एक साथ कई मोर्चे हैं—मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकना, अवैध शिकार पर नियंत्रण, सड़क और खनन परियोजनाओं के प्रभाव को सीमित करना और वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के रास्तों को संरक्षित रखना।बालाघाट में बाघों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से गौरव की बात है। लेकिन यदि जंगल लगातार सिकुड़ते गए और वन्यजीवों के आवास पर दबाव बढ़ता गया, तो यही सफलता भविष्य में संघर्ष का कारण भी बन सकती है । अब जरूरत सिर्फ बाघों की गिनती करने की नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित भविष्य की गारंटी देने वाले ठोस रोडमैप की है बालाघाट के जंगल क्या बाघों के लिए सुरक्षित रहेंगे, या विकास की दौड़ में ‘टाइगर स्टेट’ का सबसे बड़ा संकट खुद उसके जंगल बन जाएंगे ये सबसे बड़ा सवाल अब हमारे ओर प्रशासन के सामने है । बाघिन के हमले में हुई मौतों पर प्रत्येक परिवारों को 50-50 लाख दे सरकार ! पूर्व सांसद कंकर मुंजारे (सूर्यांश टाइम्स न्यूज बालाघाट)बालाघाट जिले के परसवाड़ा तहसील अंतर्गत कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बफर जोन से लगे ग्राम पंचायत कुमादेही के गांव पर्रापुर में विगत दिनों आधी रात एक आदमखोर बाघिन ने घर के भीतर घुसकर गहरी नींद में सो रही 45 वर्षीय महिला को उठाकर ले गई । इस दर्दनाक हमले में महिला की मौके पर ही मौत हो गई थी और घटना के बाद से पूरे गांव में दहशत का माहौल था ! जानकारी के मुताबिक इस आदमखोर बाघिन के हमले से हुई यह चौथी दर्दनाक मृत्यु थी ! घटना को गंभीरता से लेते हुए पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने इसे विभागीय लापरवाही का नतीजा बताते हुए पीड़ित परिवारों को 50-50 लाख रुपये मुवायजे के रूप में सरकार को देने की मांग की है !बता दे कि पर्रापुर बैगाटोला निवासी सुगनी बाई धुर्वे शनिवार 1 अगस्त रात भोजन करने के बाद अपने परिवार के साथ घर में सो रही थीं। इसी दौरान रविवार रात करीब 1 से डेढ़ बजे जंगल से भटककर एक बाघिन उनके घर में घुस आई , घर में दरवाजा नहीं होने का फायदा उठाकर बाघिन ने महिला पर हमला किया और उसे मुंह में दबाकर बाहर ले गई । अचानक चीख-पुकार सुनकर परिजन जाग गए। उन्होंने शोर मचाया और टॉर्च की रोशनी में बाघ का पीछा किया। हो हल्ला सुनकर उक्त आदमखोर बाघिन महिला को खेत मे छोड़कर भाग गई उस वक्त तक 45 वर्षीय महिला सुगनी बाई की मृत्यु हो चुकी थी ! हालांकि ग्रामीणों के आक्रोश के बाद कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की टीम ने इस आदमखोर बाघिन का सफल रेस्क्यू करते हुए उसे वनविहार भोपाल पहुँचा दिया है ! इस पूरे मामले को संज्ञान में लेते हुए परसवाड़ा के पूर्व विधायक एवं जिले के पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए !उन्होंने ग्राम पर्रापुर पहुँचकर पीड़ित ग्रामीणों से मुलाकात की और संवाद करते हुए उनकी स्थिति का जायजा लिया ! उन्होंने कहा कि संरक्षित बैगा/आदिवासीयो के उत्थान और विकास लिए सरकार द्वारा अनेको योजनाए चलाने का दावा किया जाता है लेकिन यहाँ इन गरीबो को अब तक पक्का मकान बनाकर नही दिया गया ,चंद रुपयों के लिए सिंगल लाइन बिजली कनेक्शन काट दिया गया और अब तक ना तो यहाँ इनसे मिलने ,इनकी स्थिति का जायजा लेने कोईअधिकारी पहुँचा और न ही कोई जनप्रतिनिधि!मुंजारे ने बाघिन के हमलों से हुई सभी 4 ग्रामीणों एवं मवेशियों की मौतों पर सभी संबंधित पीड़ित परिवारों को 50-50 लाख रुपयों का मुवायजा देने तथा इन्हें पक्का आवास ,बिजली पानी सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं शीघ्र प्रदान करने तथा ऐसी घटना की पुनवर्त्ति रोकने की पुरजोर मांग की है !