9 गंभीर आरोपों के बाद खनिज प्रतिष्ठान की बैठक में अध्यक्ष को नहीं बुलाने पर भी सवाल, 7 दिन में जवाब तलब
बालाघाट। जिला पंचायत बालाघाट में प्रशासनिक अधिकारों और पंचायत राज व्यवस्था को लेकर अध्यक्ष सम्राट सिंह सरस्वार और मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभिषेक सराफ, IAS के बीच टकराव अब खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। अध्यक्ष सरस्वार ने सीईओ के कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है। वहीं, जिला खनिज प्रतिष्ठान मंडल की बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष को पदेन सदस्य होने के बावजूद नहीं बुलाए जाने के मामले में भी अध्यक्ष ने कड़ा रुख अपनाया है।
अध्यक्ष की ओर से जारी पत्रों में प्रशासनिक प्रक्रिया, वैधानिक अधिकारों और जिला पंचायत की संस्थागत भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। इन घटनाक्रमों ने जिला पंचायत के कामकाज को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
9 बिंदुओं पर सीईओ से मांगा जवाब
अध्यक्ष सरस्वार द्वारा सीईओ के खिलाफ जारी कारण बताओ नोटिस में कुल 9 बिंदुओं पर आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई है। इनमें जिला पंचायत अध्यक्ष को दरकिनार करने, शासन के निर्देशों एवं निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने, वित्तीय स्वीकृतियों और निधि के आहरण में समिति की पूर्व अनुमति नहीं लेने, स्थायी समितियों की बैठकें नियमित रूप से नहीं कराने, वार्षिक प्रशासनिक प्रतिवेदन एवं लेखा समय पर परिषद के समक्ष प्रस्तुत नहीं करने जैसे गंभीर विषय शामिल हैं।
इसके अलावा पंचायत सचिवों एवं ग्राम रोजगार सहायकों के स्थानांतरण/पदस्थापना जैसे मामलों में अध्यक्ष से विधिवत सहमति नहीं लेने तथा विकास योजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण विषयों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अध्यक्ष एवं समितियों के समक्ष प्रस्तुत नहीं करने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
वित्तीय अधिकारों और समितियों की भूमिका पर भी सवाल
नोटिस में जिला पंचायत निधि से राशि के आहरण एवं भुगतान तथा धारा 52 के अंतर्गत जारी वित्तीय स्वीकृतियों को परिषद एवं सामान्य प्रशासन समिति के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की प्रक्रिया पर भी आपत्ति दर्ज की गई है। आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय से जुड़ी वार्षिक योजनाओं को सामान्य प्रशासन समिति की पूर्व सहमति अथवा अनुमोदन के बिना तैयार एवं क्रियान्वित किए जाने को लेकर भी अध्यक्ष ने जवाब मांगा है।
7 दिन में जवाब, नहीं तो कार्रवाई की अनुशंसा की चेतावनी
अध्यक्ष ने सीईओ को निर्धारित अवधि में लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। नोटिस में यह भी कहा गया है कि यदि समय सीमा में जवाब नहीं मिलता अथवा स्पष्टीकरण असंतोषजनक या आधारहीन पाया जाता है, तो संबंधित नियमों के तहत राज्य सरकार को अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भेजी जा सकती है।
अब खनिज प्रतिष्ठान की बैठक ने बढ़ाई गर्मी
मामला यहीं नहीं रुका। 18 अगस्त 2026 के पत्र क्रमांक 1083/2026 में अध्यक्ष सम्राट सिंह सरस्वार ने जिला खनिज प्रतिष्ठान मंडल की बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष को नहीं बुलाए जाने और उनके अधिकारों का हनन किए जाने का मुद्दा उठाया है। पत्र में मध्यप्रदेश शासन के जिला खनिज प्रतिष्ठान नियम 2016 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि मंडल के गठन में जिला पंचायत प्रतिष्ठान के पदेन सदस्य अध्यक्ष होते हैं। इसके बावजूद संबंधित बैठकों में अध्यक्ष को आमंत्रित नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई गई है।
“मैं पदेन सदस्य हूं, फिर मुझे क्यों नहीं बुलाया गया?”
अध्यक्ष सरस्वार ने पत्र में कहा है कि जिला खनिज प्रतिष्ठान की बैठकों में वे पदेन सदस्य हैं और बैठकों में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। पत्र के अनुसार, बैठक में अध्यक्ष की जानकारी एवं सहमति के बिना विकास कार्यों एवं अधिकारों से संबंधित निर्णय किए जाने पर भी आपत्ति जताई गई है।
अध्यक्ष ने सीईओ को निर्देशित किया है कि पत्र प्राप्ति के 7 दिवस के भीतर लिखित रूप में कारण स्पष्ट किया जाए कि उन्हें बैठकों में आमंत्रित क्यों नहीं किया गया। पत्र में यह भी चेतावनी दी गई है कि निर्धारित समय में संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने की स्थिति में मामले को आयुक्त, खनिज संसाधन विभाग, भोपाल के समक्ष कार्रवाई के लिए भेजा जाएगा।
जिला पंचायत में अधिकारों की जंग या प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल?
लगातार सामने आ रहे इन पत्रों ने जिला पंचायत बालाघाट के प्रशासनिक कामकाज पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ अध्यक्ष सरस्वार द्वारा सीईओ की कार्यप्रणाली को लेकर नौ बिंदुओं पर जवाब तलब किया गया है, वहीं दूसरी ओर खनिज प्रतिष्ठान की बैठक में पदेन सदस्य के रूप में अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी लिखित आपत्ति दर्ज कराई गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला पंचायत में निर्वाचित अध्यक्ष के वैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तालमेल में गंभीर कमी आ गई है? अध्यक्ष के तेवर से साफ है कि मामला अब महज अंदरूनी प्रशासनिक पत्राचार तक सीमित रहने वाला नहीं है।
सीईओ के जवाब और उसके बाद शासन स्तर पर होने वाली कार्रवाई पर अब पूरे जिले की नजर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह विवाद जिला पंचायत की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।



