लाजिक को मटियामेट कर दिया पीएम मोदी ने
इतना कमजोर प्रधान सेवक आज तक नहीं देखा देश ने

…….अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार बैतूल(m.p)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लालकिले से देना पड़ गया बिना टेलीप्राम्पटर के भाषण और पीएम मोदी कई बार लड़खड़ाते, फंबल करते हुए नजर आए। वैसे फंबल होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री का लालकिले पर खड़े होकर बचकानी बातें करना जरूर बहुत बड़ी बात है। प्रधानमंत्री किसी पार्टी का नहीं होता है वह पूरे देश का होता है और जब वह 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले की प्राचीर पर खड़े होकर बोलता है तो उसका संबोधन राष्ट्र के नाम संदेश होता है ना कि किसी पार्टी विशेष का राजनीतिक भाषण होता है। देश के सामने आने वाले साल में सरकार की रीति-नीति को बतलाना होता है ना कि विपक्ष को कोसना होता है। लेकिन लगता है शायद इस बेसिक और बुनियादी बात से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पिछले बारह साल से कोई लेना देना नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2009-10 में देश के भीतर बिकने वाली इलेक्ट्रिक वाहनों की तुलना 2026 वाले एआई वाले साल से करते हुए अपनी पीठ थपथपाई और दुनिया भर में हास्य का पात्र बन गये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भारत की तुलना करनी ही थी तो चाइना, अमेरिका, रशिया, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, फ्रांस आदि विकसित देशों से करते ! जो देश टेक्नोलॉजी के मामले में भारत से कोसों आगे हैं। मगर नहीं उन्हें तो पूर्ववर्ती सरकारों को कोसना है। 10 साल बाद 2036 में होने वाले ओलंपिक में भारत के खिलाडिय़ों की प्रतिभागिता बढ़ाने का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि 5 से 15 साल तक के खिलाड़ियों को ढूंढ कर तराशने के लिए विशेष प्रशिक्षण देने का अभियान चलाया जायेगा। अच्छा होता यह बोलने के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसी स्पोर्ट्स एक्सपर्ट से सलाह मशविरा कर लिया होता कि मैं लालकिले पर खड़े होकर अपने भाषण में यह सब बोलने वाला हूँ, ऐसा बोलने से कहीं मैं जग हंसाई का पात्र तो नहीं बन जाऊँगा। लेकिन मुश्किल तो यही है कि वे किसी से सलाह मशविरा करते कहां हैं और कोई दे भी दे तो सुनते कहां हैं। उन्होंने तो खुद को नान बायोलाजिकल घोषित कर ही रखा है।

कैसे किसी 5 से 15 साल के बच्चे को एकदम से वर्ल्ड क्लास खिलाड़ी बनाया जा सकता है ? यह तो हथेली पर सरसों उगाने वाला काम है और वह भी तब जब भारत के पास विश्व स्तरीय तो छोड़ दीजिए स्पोर्ट्स के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तक नहीं है। मोदी सरकार का उन खिलाडिय़ों के साथ कैसा सौतेला व्यवहार है जिनकी विचारधारा बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा से मेल नहीं खाती। उनके साथ किस तरह का राजनीतिक विव्देष लिया जाता है इसका खुला नजारा जंतर-मंतर पर दुनिया भर में भारत का परचम लहराने वाली महिला पहलवानों के साथ की गई नंगपने में सारी दुनिया ने देखा है। लेकिन फेंकना है तो फेंक दिया !

2024 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले पर खड़े होकर विशुद्ध राजनीतिक भाषण देते हुए कहा था कि वे एक लाख से अधिक राजनीतिक बैक ग्राउंड से ना आने वाले युवाओं को बीजेपी से जोड़ेंगे। लेकिन आज वे ऐसा कोई आंकड़ा बताने की स्थिति में दिखाई नहीं देते कि उन्होंने कितने बिना राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को बीजेपी से जोड़ कर विधायक, सांसद बनाया है। क्योंकि वह और उनकी पार्टी आज भी अपने बिलों को पास कराने के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले विधायकों, सांसदों की चौखट पर माथा टेकते हुए अक्सर दिख जाती है। 2024 में ही पीएम मोदी ने एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप कराने की बात की थी लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बमुश्किल 30 हजार युवाओं को भी इंटर्नशिप नहीं मिल पाई है।

निम्न और मिडिल क्लास के बीच भावनात्मक पांसा फेंकते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कोचिंग क्लासेस की स्पर्धा गरीब और सामान्य परिवार के लोगों के लिए बहुत बड़ा बोझ बन गई है। खासकर मिडिल क्लास के लोग खुद को प्रतिष्ठित परिवार के समकक्ष खड़ा करने के लिए कर्ज के बोझ तले दबते चले जा रहे हैं। अब परिवार पर आर्थिक बोझ ना आए इसलिए हमने युवाओं के लिए विभिन्न परीक्षाओं की फ्री आनलाईन कोचिंग कराने का निर्णय लिया है। हम डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, उत्तम टेलेंट, टीचर्स को जोड़ कर देश के नौजवानों को मुफ्त कोचिंग देने का एक पूरा नेटवर्क खड़ा करने वाले हैं। लेकिन नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि हर साल ड्रापर्स की संख्या बढ़ती जा रही है। सुविधाजनक कोचिंग मिलना तो दूर की कौड़ी है भारत में विद्यार्थियों के लिए बेसिक सुविधाएं तक नहीं हैं। शायद इसीलिए जं जी और जं अल्फा को सड़क पर उतर कर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

केन्द्र और राज्य सरकारें खासतौर पर बीजेपी शासित प्रदेशों में सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। जो हैं भी उनमें भी पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ और राजस्थान के अलवर में छात्रों को सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है, सरकार के खिलाफ नारेबाजी करनी पड़ रही है। यहां तक बोलना पड़ रहा है कि एक भी कमरा बैठने लायक नहीं है। मुफ्त कोचिंग की लंबतरानी फेंकने से अच्छा होगा कि पहले सरकारी स्कूलों में सुधार किया जाए, बंद कर दिए गए सरकारी स्कूलों को फिर से खोला जाए और स्कूलों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ही बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराया जाए। कहा तो यही जाता है कि मोदी गवर्नमेंट के बारह साला कार्यकाल में देशभर में तकरीबन एक लाख सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं।

बड़ी-बड़ी बातें करना अलग बात है बच्चों को बेसिक सुविधाएं देना अलग बात है। जो सरकार एक पेपर ठीक से नहीं करा पा रही है। बार बार पेपर लीक हो रहे हैं और युवाओं को पेपर लीक रोकने के लिए देशव्यापी आंदोलन कर सरकार की अमानवीय यातनाओं को सहना पड़ रहा है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं द्वारा किए गए गांधीवादी आंदोलन के दौरान मोदी गवर्नमेंट द्वारा सारी मानवीय संवेदनाओं की तिलांजलि देकर छात्र छात्राओं पर वाटर कैनिंग, कील लगी लाठियों, पैटल गन तक का उपयोग किया गया है। बिहार की भाजपा वाली डबल इंजन की सरकार ने तो युवाओं पर एके-47 राइफल तक तान दी। ऊपर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दुस्साहस देखिए कि वे लालकिले पर खड़े होकर आंदोलन करने वाले युवाओं की सोच पर सवाल उठाते हुए कह रहे हैं कि वर्षों तक देश की सत्ता में माओवादी सोच के लोग गलियारों में अपनी जगह बनाकर बैठे थे। हथियारी नक्सली तो चले गए लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में लगे रहते हैं। हिंसा अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह बयान साफ साफ बताता है कि वो लोकतांत्रिक आवाज़ उठाने वालों से, आंदोलन करने वालों से, यहां तक कि अहिंसात्मक आंदोलन करने वालों से कितनी नफरत करते हैं। तभी तो उन्हें (सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत की तरह काॅकरोच) नक्सली, अर्बन नक्सली, आंदोलनजीवी बोलते रहते हैं। विपक्षी नेताओं की सोच को माओवादी सोच बताने से कतराते नहीं हैं। पूर्व सरकारों खासकर कांग्रेसी सरकारों को सपने में भी कोसते रहते हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी उस पक्षी की तरह व्यवहार करते हैं जो जमीन में अपना सिर गड़ा कर पांव ऊपर कर टूटते हुए आसमान को अपने पैरों पर रोकने का ख्वाब देखता है। मणिपुर पिछले तीन चार साल से सुलग रहा है लेकिन मलहम लगाने के बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यही साबित करने का प्रयास किया है कि जैसे मणिपुर भारत का हिस्सा ही ना हो। यानी मोदी गवर्नमेंट पूरी तरह से फेल हो चुकी है। अगर देशभर के छात्रों ने दिल्ली के जंतर-मंतर और देशभर में अलग अलग जगह आंदोलन ना किया होता तो मोदी सरकार ना तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेती और ना ही पेपर लीक को लेकर कानून बनाती। युवाओं की एकजुटता का ही परिणाम है कि मोदी गवर्नमेंट को पेपर लीक वाला बिल लाकर आननफानन में पास करवाना उसकी मजबूरी बन गया। देखा जाए तो जो शब्द प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आंदोलनकारी युवाओं और विपक्ष के लिए इस्तेमाल किए स्थिति बिल्कुल उसके उलट है।

महिला आरक्षण बिल को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पार्लियामेंट में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया गया जो पिछले अनेक वर्षों से एक सपने की तरह राजनीतिक अखाड़े का शिकार होता रहा। मैं लालकिले की प्राचीर और तिरंगे की छाया में खड़े होकर सभी राजनीतिक दलों से प्रार्थना करता हूं कि महिलाओं के सामर्थ्य के पुजारी बनिए, महिलाओं के सम्मान में आगे आइए। जिससे जल्द से जल्द हमारी माताओं बहनों को विधानसभा और लोकसभा में तैंतीस प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिले और वे भारत की नीति परत के अंदर अपना योगदान दे सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसा वर्ताव किया जैसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम उनने अकेले के भरोसे पास करा लिया था। उसमें विपक्षी पार्टियों का कोई योगदान नहीं था और अब विपक्ष उसको लागू करने से रोक रहा है। जबकि हकीकत यह है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम दोनों सदनों में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के सहयोग से पारित हुआ था और विपक्ष ने इसे वर्तमान संख्या के आधार पर सभी विधानसभा और लोकसभा में लागू करने की पुरजोर वकालत की थी लेकिन मोदी गवर्नमेंट ने ही इसे लागू करने के बजाय विधानसभा और लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर लागू करने और परिसीमन वाले बिल के साथ जोड़ दिया है। आखिर क्यों ? विपक्षी सांसद जब भी यह सवाल उठाते हैं तो पीएम मोदी इस बात को लेकर विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर देते हैं। महिलाओं के बीच इस संदेश को देने की कोशिश करते हैं कि आपके आरक्षण को विपक्षी सांसद रोक रहे हैं। जो सरासर झूठ का पुलिंदा दिखाई देता है।

जो शब्द 15 अगस्त 1947 को Trust with 
dennistony में गूंज रहा था वही शब्द अभिव्यक्ति की आजादी का आज युवाओं के जरिए पूरे देश में गूंज रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था When the soul of the nation long pressed finds aeterons यानी राष्ट्र की आत्मा जो लंबे समय से दबी हुई थी अपनी अभिव्यक्ति को पाती है। और संयोग देखिए जो संविधान लिखा गया, जिस संविधान के आसरे देश में सत्ता को ताकत मिली और मौजूदा राजनीतिक सत्ता द्वारा इस दौर में अभिव्यक्ति को ही गायब कर दिया गया। लेकिन 2026 में युवाओं के जरिए वही अभिव्यक्ति जो राष्ट्र की आत्मा है एक झटके में जाग गई है। उस दौर में पीएम नेहरू ने कहा था “वह क्षण आ गया है जब हम पुराने से निकल कर नए की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। एक युग समाप्त हो गया है और राष्ट्र की जो आत्मा लंबे समय से दबी हुई थी वह अपनी अभिव्यक्ति को पा रही है। ऐसे समय इतिहास में कम ही आते हैं। इसीलिए हमें भारत और भारत के लोगों की सेवा तथा मानवता और व्यापक उद्देश्यों के प्रति समर्थन की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए।

1947 में विभाजन का दर्द था। लेकिन उस दौर में देश के नागरिकों को लेकर कोई शक-सुबहा नहीं था मगर इस दौर में देश के नागरिकों को लेकर शक-सुबहा दोनों है। उस दौर में परिस्तिथियां मानवता की दिशा में कदम बढ़ा रहीं थीं और इस दौर में गरीबी की रेखा के आंकड़ों के सहारे 25 करोड़ लोगों को निकाल लिया गया है और भारत दुनिया के मानचित्र में अब भी सबसे भूखा देश है। देश के चंद लोगों के हाथों में सिमिटती चली गई पूंजी से आंकडों के लिहाज से देश की इकाॅनामी तो बढ़ी लेकिन उन चंद लोगों को अलग कर दिया जाय तो प्रतिव्यक्ति आय ना के बराबर है। यानी देश की इकाॅनामी का राज चंद हाथों में सिमट गया है और इस हकीकत को बयां करने हिम्मत देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले पर खड़े होकर भी कर नहीं सके। देश की आत्मा और देश का भविष्य जिन सपनों को देखना चाहता है देश की मौजूदा राजनीतिक सत्ता उन सपनों को रौंद कर एक ऐसे सपने की रचना करने में लगी हुई है जिसमें लोगों की भागीदारी, उनका सहकार और उनकी अपनी भावनाओं की कोई जगह है ही नहीं।

लालकिले के प्राचीर पर खड़े होकर एक 75 वर्षीय नान बायोलाजिकल वृद्ध आज पैदा होने वाले बच्चे को, 21साल बाद यानी 2047 में जब आजादी के 100 वर्ष पूरे होंगे तब भी जब वह खुद 96 वर्षीय वयोवृद्घ होकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहने का सपना पाले हुए है, विकसित भारत का सपना ठीक उसी प्रकार से एक बार फिर से दिखा रहा है जैसा 12 साल पहले “अच्छे दिन आयेंगे, हर भारतीय के खाते में पन्द्रह लाख रुपये जमा होंगे” का दिखाया गया था। जबकि वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन का डाटा कहता है कि भारत में प्रतिव्यक्ति आय और कम हो गई है। मौजूदा वक्त की हकीकत यही है कि देश की इकाॅनामी वर्ल्ड रैंकिंग के हिसाब से छठे पायदान यानी 3.69 ट्रिलियन डॉलर पर खड़ी है। देश का युवा, जं जी, जं अल्फा खुद को अंधेरे में खड़ा हुआ पा रहा है इसीलिए वह उस अंधेरे से निजात पाने के लिए यानी अंधेरे से उजाले की दिशा में बढ़ने के लिए संघर्ष करने पर उतारू है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले पर खड़े होकर युवाओं, जं जी, जं अल्फा के बीच कोई लौ जगा ही नहीं पाए। युवाओं, जं जी, जं अल्फा के सपने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लक्ष्य दोनों दो अलग अलग दिशाओं में जाता हुआ दिखाई दिया।

पीएम मोदी की नजर में शायद विकसित होने का मतलब यही है कि अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर भारत की इकाॅनामी बढ़ जाए। भले ही देश के भीतर गरीबों की तादाद बढ़ती चली जाए, देश के भीतर भुखमरी की स्थितियां पैदा हो जाए, देश के भीतर अज्ञानता रेंगने लगे, देश के भीतर असमानता का पैमाना बढ़ता चला जाए। लगता तो यही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भरे हुए पेट, संवैधानिक रूप से मिले हुए विशेषाधिकार, अकूत सुख सुविधाओं से लैस, देश के संविधान से मिले अधिकारों को अपनी मनमर्जी, अपने तरीके से देश पर लागू करते हुए देश के युवाओं को विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी बता कर उनके मनो मस्तिष्क को वाश करना चाह रहे हैं।

देश के भीतर की स्थितियां इतनी ज्यादा नाजुक हैं कि विकसित देशों से कहीं ज्यादा सुख सुविधाओं का उपभोग देश के 20 बड़े कार्पोरेट्स हाउस और देश की मौजूदा राजनीतिक सत्ता कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गाड़ियों का काफिला दुनिया के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की तुलना में सबसे आगे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हवाई जहाज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हवाई जहाज के बाद दूसरे नंबर पर आता है। यानी इतना मंहगा हवाई जहाज दुनिया के किसी भी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष के पास नहीं है वह भी तब जब भारत दुनिया में भुखमरी की कतार में सबसे आगे खड़ा हुआ है। दुनिया के विकसित देश भी अपनी गवर्नेंस को चलाने में इतना खर्च नहीं करते जितना भारत में किया जाता है। किसी भी तरह का इनोवेशन ना होने से भारत का शेयर बाजार कंगाल हो चला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर कोई काम है ही नहीं। सेमीकंडक्टर को लेकर सोचा ही नहीं गया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सब कुछ परोसते चले गए लालकिले पर खड़े होकर।

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर लालकिले की प्राचीर से देश को दो ही वादे करने थे। पहला वादा – अब भारत में कोई भी भूखा नहीं सोयेगा, एक भी आदमी सरकारी खैरात पर अपना जीवन यापन नहीं करेगा, सबको बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी, सबको उच्च स्तरीय शिक्षा मिलेगी, सभी को बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराया जायेगा। दूसरा वादा – इस देश की मौजूदा राजनीतिक सत्ता अपने विशेषाधिकार छोड़ रही है, अपनी सुख सुविधाओं का त्याग कर रही है और गवर्नेंस को चलाने के लिए देश की जनता की तुलना में मिनिमम खर्च करेगी। लेकिन ऐसा लगा जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो लालकिले पर खड़े होकर पतंग उड़ा रहे हैं और उस पतंग को इतनी ढील दे रहे हैं कि आसमान में वह 2047 के विकसित भारत की तस्वीर दिखने लग जाए।

कायदे से तो हर उस माता-पिता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 15 अगस्त 2026 के इस भाषण को सहेज कर रख लेना चाहिए और 21 बरस बाद उस बच्चे को यह कहते हुए देना चाहिए कि 21 बरस पहले तुम्हारे जन्म के वक्त इस देश के प्रधानमंत्री ने तुमसे यह वादा किया था। लेकिन नहीं आज की हकीकत तो यही है कि देश के युवाओं, जं जी, जं अल्फा ने देश को बता दिया है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब होता क्या है, जिसको देश की संसद और सियासत ने छुपा दिया था, ठग लिया था, उस पर पहरा लगा दिया था।

बहरहाल कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लालकिले पर खड़े होकर दिया गया पूरा भाषण गंदी मानसिकता की राजनीति में सराबोर, पूर्व सरकारों, जिसमें भाजपा की अटलबिहारी बाजपेई वाली सरकार भी शामिल है, को नीचा दिखाने की कोशिश करता हुआ और बात बात में विपक्ष पर तंज कसता हुआ दिखाई दिया।

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