खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)

        क्या 2004 दुहराया जाने वाला है ?

खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)

संवैधानिक तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चीफ जस्टिस आफ इंडिया को एक ही पलड़े पर रखा गया है। वह इसलिए कि वे पूरी तरह राजनीतिक दबाव से मुक्त रहें इसीलिए इन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया को जटिल रखा गया है। संविधान के आर्टिकल 124/4 में प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जस्टिस को कदाचार, अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है यानी भृष्टाचरण, पद का दुरुपयोग साबित होने पर उसे पदच्युत कर सकते हैं और जब मुख्य चुनाव आयुक्त और चीफ जस्टिस आफ इंडिया एक ही पलड़े पर बैठे हुए हैं तो यह नियम उन पर भी लागू होता है मतलब मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भृष्टाचरण, पद का दुरुपयोग करने पर कुर्सी से उतार कर बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। मगर जब मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपात पूर्ण कार्रवाई करने, भेदभावपूर्ण आचरण करने, चुनावी धोखाधड़ी करने, एसआईआर को सेंट्रलाइज कर जांच में बाधा डालने के दस्तावेज़ी साक्ष्यों के साथ लोकसभा और राज्यसभा में पूरी प्रक्रिया पूर्ण करते हुए विपक्षी पार्टी द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव लाया जाता है तो उस पर बहस करने से पहले ही लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति उसे खारिज कर मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पीछे छुपा लेते हैं। तो फिर इस दौर में जो खुले तौर पर चुनाव आयोग के भीतर से उजागर हो रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त लगातार पक्षपातपूर्ण कार्रवाई कर रहे हैं, भेदभावपूर्ण आचरण कर रहे हैं तो उन्हें पद से हटाना लाजमी होगा लेकिन सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट और संसद में जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग ढाल बनकर संरक्षण दे रहे हैं तो आखिर निकालेगा कौन ? यह बात अलहदा है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर को अपने मेरठ और वाराणसी के निर्धारित कार्यक्रमों को रद्द करना पड़ा।

जिस तरह से अभी तक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को ढाल बनकर संरक्षित कर रही गुजराती जोड़ी अपने हाथ खींच उन्हें अनाथ सा बना रही है तो खुद की बची खुची साख को बचाये रखने के लिए चीफ इलेक्शन कमिश्नर क्या अपने पद से स्वमेव त्यागपत्र दे सकते हैं ? वैसे विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ ही काॅकरोच जनता पार्टी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त को अल्टीमेटम दिया हुआ है कि वे 2 अक्टूबर 26 के पहले अपने पद से हट जाएं अन्यथा 2 अक्टूबर 26 से जंतर-मंतर के साथ ही देशभर में आंदोलन किया जाएगा क्योंकि देश को पालिटीशियंस ने तमाशा बना दिया है। चुनाव आयोग ने संविधान प्रदत्त लोगों के हक अधिकार छीन लिए। जब हमारे देश में 90 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीब थी, साक्षरता रेट 10 फीसदी से भी कम था। देश को चलाने के लिए पैसा नहीं था। उस समय बाबा साहब और पंडित नेहरू ने कहा था कि देश के हर नागरिक को वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए और चुनाव आयोग एसआईआर के जरिए चुन चुन कर उन वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा रहा जिन पर जरा सा भी शक है कि यह मौजूदा सत्ता पार्टी को वोट नहीं देगा ! एसएसआर के जरिए 18 साल पूरे होने पर युवा का नाम वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाता है वह प्रक्रिया जो दो महीने पहले पूरी कर दी जानी चाहिए थी वह अभी तक शुरू नहीं की गई है। जं जी से मौजूदा सत्ता इतनी भयभीत है कि चुनाव आयोग उसे सत्ता में बनाए रखने के लिए जं जी को वोटर लिस्ट से अलग करने के लिए सारे हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं कर रहा है !

चुनाव आयोग की कारगुजारियां मौजूदा सत्ता को सत्ता में बनाए रखने के लिए जो कर रहीं सो कर रहीं है लेकिन एक ऐसी तस्वीर ने मौजूदा सत्ता को 2004 में निर्मित हुई परिस्थितियों की ओर देखने और सोचने को विवश कर दिया है। 2004 यानी शाइनिंग इंडिया के आसरे बीजेपी यानी अटलबिहारी बाजपेई और उनके सारे सहयोगी दल आश्वस्त थे कि एक बार फिर से सत्ता में वापसी हो जाएगी। 30 मई की शाम को एक खबर निकल कर आई कि मुकेश अंबानी 10 जनपथ पर गए हैं और खबर ने बीजेपी सहित सभी सहयोगियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी और उन्हें विश्वास सा हो गया कि बाजपेई का अटल सूरज अस्त हो चुका है। दूसरे दिन के सूरज ने घोषणा कर दी कि शाइनिंग इंडिया की चमक गायब हो गई है। यानी कार्पोरेट ने अपनी ताकत का अह्सास करा दिया है। अक्टूबर 1986 – राजीव गांधी की सरकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज (धीरूभाई अंबानी) के बीच कारोबार और नीतिगत तनाव चल रहा था। तब वित्त मंत्री थे वीपी सिंह। कहा जाता है कि तब प्रणव मुखर्जी ने धीरूभाई अंबानी की प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच सुलह वार्ता कराई थी (सत्ता की ताकत और कार्पोरेट का नेक्सेस) । लगता है उस समय की कड़वाहट आज भी राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी के भीतर भरी हुई है तभी तो वो अंबानीज को निशाने पर लेने से कतराते नहीं हैं।

भारत की राजनीति में देश की जनता ने पहली बार कार्पोरेट और सत्ता के नेक्सेस का मिजाज खुलकर 2014 के आम चुनाव में देखा । जिसमें चुनाव प्रचार पर 60 हजार करोड़ रुपये फूंक दिए गए। यह अब तक हुए चुनावों में सबसे मंहगा चुनाव था। वैसे इसकी शुरुआत 2012 में वाइब्रेंट गुजरात में हो चुकी थी जहां पर उसी कार्पोरेट की पूरी कतार मौजूद जो आज की तारीख में देश की पूरी की पूरी व्यवस्था को अपनी हथेली में समेटे हुए है। उसने तय कर लिया था कि कांग्रेस की सत्ता को उखाड़ फेकना है इसलिए उसने 2014 के आम चुनाव में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीछे खड़े होकर बड़ी मात्रा में पूंजी को झोंकना शुरू किया। पूरे देश ने देखा किस तरह से नरेन्द्र मोदी ने गौतम अडानी के चार्टर्ड में बैठ कर पूरे देश भर में लगभग 300 से ज्यादा चुनावी रैलियां की थीं। 2019 आते आते राजनीति का यह मिजाज चुनाव को सबसे ज्यादा मंहगा बना गया। यानी चुनाव प्रचार में एक लाख करोड़ से ज्यादा फूंक दिए गए। इसके बाद देश के भीतर बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों और चुनाव आयोग की सक्रियता ने विपक्षी पार्टियों को संदेश देना शुरू कर दिया कि आने वाले समय में चुनाव लड़कर जीतना मुश्किल है। और यह सच 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए चुनावों में साफ साफ देखा।

कार्पोरेट का नेक्सेस सत्ता को कहां से कहां पहुंचाता है और सत्ता के साथ का याराना कार्पोरेट के नेटवर्थ को कहां से कहां तक लेकर जाता है इसे गौतम अडानी और मुकेश अंबानी की छलांग लगाती हुई नेटवर्थ से बखूबी समझा जा सकता है। गुजराती जोड़ी इस बात को भलीभांति समझ रही है कि अगर कार्पोरेट वार (विपक्षियों के पास रसद (पूंजी) पहुंचने लगी) हुआ तो विपक्ष मजबूत होता चला जाएगा और सब कुछ एक झटके में बिखर जाएगा। इसलिए उनकी कोशिश रहती है कि किसी भी सूरत में कार्पोरेट वार होना नहीं चाहिए। इसीलिए 2014 तक ट्रस्ट के जरिए आने वाली पालिटिकल फंडिंग को इलेक्ट्रोरल बांड्स की ओर डायवर्ट किया गया जिससे बीजेपी का खजाना भरने लगा और विपक्षी पार्टियों के पास आने वाली फंडिंग 80 फीसदी तक कम हो गई। वो तो सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोरल बांड्स को गैरकानूनी घोषित कर दिया यानी उसके जरिए एकत्रित की गई पूंजी काली कमाई हो गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस काली कमाई को जप्त करने की हिम्मत नहीं दिखाई। जिस भी कार्पोरेट, इंडस्टियलिस्ट, बिजनेसमैन, बिल्डर ने विपक्ष की तरफ जरा सा भी हाथ बढ़ाया उसके ठिकाने पर ईडी, आईटी, सीबीआई पहुंच गई।

शायद इसीलिए जं जी से ना केवल व्यवस्था को बल्कि पालिटिकल परिवर्तन से लेकर सोशल और इकोनॉमिक ट्रांसफार्मेशन की दिशा में बढ़ने के लिए कहा गया। और जं जी जंतर-मंतर पर आकर खड़ा हो गया तो शिक्षा मंत्री की कुर्सी चली गई। जं जी ने चेताया तो छात्रों पर दर्ज सारी एफआईआर वापस ले ली गई। अब जं जी ने अल्टीमेटम दिया है कि 2 अक्टूबर से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफा हो जाना चाहिए वर्ना 2 अक्टूबर से जंतर-मंतर सहित देशभर में आंदोलन किया जाएगा। जिसका असर यह दिखा कि ज्ञानेश को अपने पीछे छुपाने वालों ने उसे सामने लाकर अपने हाल पर छोड़ दिया है। तो क्या 2 अक्टूबर से पहले ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफा हो जाएगा ? क्या सरकार को समझ में आ गया है कि उसकी लोकप्रियता खत्म हो चली है ? क्या आने वाली चुनावी जीत उसे दो अंकों में सिमटा देगी ? क्या कार्पोरेट हाउसेज शिफ्ट हो जाएंगे ? सरकार और कार्पोरेट की धड़कनें अव्यवस्थित हैं क्योंकि सरकार को सत्ता बचानी है और कार्पोरेट को धंधा करना है। अमेरिका में अडानी के ऊपर चल रहे घूसखोरी के मामले को घूसखोर के जरिए घूस देकर कैसे निपटाया गया दुनिया के सामने खुलकर आया।

मोदी सरकार (मोदी-शाह) की सांसें इसलिए भी अटक रहीं हैं कि अभी तक जो अडानी-अंबानी राहुल गांधी के निशाने पर रहा करते हैं उनमें से एकाएक अंबानी क्यों बाहर हो गए ? इंदौर में हुए छात्रों की गूंज कार्यक्रम के बैनर में जहां मोदी-शाह-भागवत (एक ही परिवार), नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल, गौतम अडानी और मुकेश अंबानी थे वहीं चंद रोज पहले चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश गुप्ता के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गये आंदोलन के बैनर से मुकेश अंबानी गायब था उसकी जगह प्राइम मिनिस्टर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी के मिश्रा और चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार गुप्ता की एंट्री हो गई। बात बढ़ते बढ़ते देशद्रोही तक आ गई। जिसमें फिल्मकार, मीडिया हाउस को चलाने वाले, बाबा, पालिटीशियन, कैबिनेट मिनिस्टर्स, जय शाह, बृजभूषण तक शामिल हैं।

Prime Minister and Amit Shah are both going to be investigated for what has been done. Without any doubt. Both the Prime Minister and Amit Shah are at the top of this conspiracy. And they are going to be investigated for they have done to this country. This is an act against the Indian State. This is an act against India’s people.

जहां कल तक अडानी अंबानी को यह लग रहा था कि सब कुछ पीएम मोदी के ईशारे पर चल रहा है लेकिन जब परिस्थितियां नाजुक होने लगीं तो अमित शाह को हाशिये पर धकेल दिया गया। तो सवाल उठा कि देश चला कौन रहा है ? जब मौजूदा वक्त में इतने गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं तब देशद्रोहियों की कतार में मुकेश अंबानी की तस्वीर क्यों नहीं है ? क्या 2004 दुहराया जाने वाला है ? क्या अडानी, अंबानी और दूसरे कार्पोरेट्स नया रास्ता टटोलेंगे ?

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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