खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)
काॅकरोच के बाद मक्खी शब्द का इस्तेमाल कर सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत ने प्रगट कर दी देश के युवाओं को लेकर अपने मन में भरी नफरत



दिल्ली का जंतर-मंतर ऐसा बना दिया गया जैसे किसी हारे हुए भयभीत राजा का अंतिम बचा हुआ किला। ऊंची दीवारों से घिरा हुआ जिसमें राजा छुपकर बैठा है। काॅकरोच जनता पार्टी के द्वारा 10 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर किया गया प्रदर्शन भारतीय इतिहास का सबसे सफल प्रदर्शन है क्योंकि प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पूरी की पूरी सरकार सड़क पर आ गई है। सरकार ने जंतर-मंतर की तरफ जाने वाली हर सड़क को अपने कब्जे में लेने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। मोदी सरकार ने अपना सामान अपना ईमान सब कुछ दांव पर लगा दिया। All we wanted to do is a peaceful protest and they’re taking us up from the flight like we are criminals they are not letting they are not allowed by others to devote the flight they are causing inconvenience to the other passengers. All you can see where the nation is hairy they are heard to arrest us directly from the flight. This is something not even Indira Gandhi had done. This is dictatorship where Delhi police has attered the flight and trying to arrest us. आ जाओ कर लो अरेस्ट। अरेस्ट होने के लिए आए हैं हम। सर डरेंगे नहीं आपसे। Are not afraid of you.
काॅकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके द्वारा कहा गया ये शब्द मोदी गवर्नमेंट के मुंह पर मारा गया करारा तमाचा है। हवाई अड्डे या कहें हवाई जहाज में घुसकर काॅकरोच जनता पार्टी के फाउंडर उस अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया जिसको चंद महीने पहले गृहमंत्री अमित शाह की दिल्ली पुलिस घुटनों के बल चलकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की परमीशन लेटर एयरपोर्ट में ही सौंपने गई थी। शायद उसके पीछे मोदी गवर्नमेंट की यह सोच रही होगी कि ऐसा करके वह युवाओं को अपनी तरफ करके अपना उल्लू सीधा कर लेगी लेकिन दांव उल्टा पड़ा तभी तो बीजेपी के पितृ संगठन के मुखिया को युवाओं से संवाद बनाने की मशक्कत करनी पड़ी थी।
दीपके के साथ ही आशुतोष रांका को भी हिरासत में लिया गया। मोदी गवर्नमेंट कितनी अधिक भयभीत है इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जं जी के बीच अच्छी-खासी लोकप्रियता हासिल कर चुके ध्रुव राठी को उसके गुरूग्राम वाले घर पर ही कैद कर लिया गया। वह तो अपने घर से निकला भी नहीं था। इस नौजवान यूबर को कैद करने दिल्ली पुलिस दल-बल के साथ गई थी। सीजेपी की सदस्य रत्ना सिंह को डिटेन करने के लिए उसकी गाड़ी को दो दर्जन से ज्यादा जवानों ने घेर लिया। यूबर काव्या कर्नाटक को भी डिटेन किया गया। न केवल सीजेपी के लोगों को हिरासत में लिया गया बल्कि उसे सपोर्ट करने वाले जं जी भी डिटेन किए गए।
यह वही दिल्ली है जो लोगों के सपने में हुआ करती है, सपना बनकर लोगों के खेत खलिहान में पहुंच जाती है उसी दिल्ली को मोदी गवर्नमेंट ने 10 अक्टूबर 2026 को उजड़ी मांग (विधवा) की तरह बना दिया। ऐसा लगता है कि उसकी आत्मा निकल चुकी है। दिन के वक्त भी वह प्रेत की तरह दिख रही थी। ऐसा लगा जैसे सरकार आंसू गैस के गोले, बैरीकेट, जवानों की तैनाती करके लोगों को खदेड़ने का उत्सव मना रही है और लोग शोक बनकर शामिल हो रहे हैं। है ना तमाशा कि सरकार खुद ब्लाक करके अनाउंसमैंट करवा रही है जनता ब्लाक करेगी तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। Attension Please ! All persons present here are informed that an order under section 163 of the PNSS is karli enforced in this area as per the order gathering here taking out the procession blocking the road and carrying out any activities prohibited under the order are not allowed.
देखा जाय तो बहुत मुश्किल से उन लोगों के समर्थन से यह दिन आया है जो पिछले एक दशक से ज्यादा समय से विनाश का इंतजार कर रहे थे। हर सवाल को कुचलते रहे। हर झूठ को सच मानकर सीने से लगाते रहे। बोलने के अधिकार पर हमला किया। हमला हुआ तो समर्थन किया। समर्थन करने में दिक्कत आई तो धर्म का इस्तेमाल किया। गोदी चैनलों ने हमला किया। बोलने को विद्रोह बताया। सवाल पूछने को देशद्रोह कहा। अर्बन नक्सल, दिमागी नक्सल जैसे शब्द भी इसी तरह के दिनों के लिए गढ़े गए कि जब जनता आएगी तो उसे घेरा जाएगा, रोका जाएगा, पीटा जाएगा, हिरासत में लिया जाएगा। जिस दिल्ली के भीतर लोग अपने परिवार के साथ रामलीला मैदान में भी बिना हिचक चले जाते थे उसी दिल्ली में बैरीकेटों में फंसने की संभावना प्रबल हो गई है। जो सरकार बांहे फैलाने का नाटक करती है, चुनाव के समय दस हजार रुपये बांट कर वोट लेती है उसकी आंखों में इमेजिन ड्रेगन का यह गाना दिखाई देता है। When you feel my heat look in to my eyes it’s where my demons hide it’s where my demons hide do not get to close it’s the dark side it’s where my demons hide it’s where my demons hide. This is my kingdom come it’s where my demons hide.
जो दिल्ली देश का दिल है। जिसके लिए करोड़ों देशवासियों ने आजादी के पहले और आजादी के बाद लगातार संघर्ष करते हुए कुर्बानी दी। उसी दिल्ली को अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए निजाम ने नर्क बनाने में कोई संकोच नहीं किया। देश की राजधानी जनता से छीनकर सुरक्षा बलों के हवाले कर दी गई। दिल्ली आने वाली ढाई सैकड़ा से ज्यादा ट्रेनों को केंसिल, रास्ता बदल दिया गया। 2014 में जनता ने हंसी खुशी नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को वोट देकर मोदी को प्रधानमंत्री बनाया वही जनता अब प्रधानमंत्री मोदी पर चुनाव आयोग के जरिए साजिश रचकर वोट चोरी का इल्जाम लगा रही है। इसमें कोई तू-तू मैं-मैं नहीं है कि तेरह करोड़ लोगों से वोट का अधिकार छीन लिया गया है। जब जनता सड़क पर उतर आई तो चुपके से वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने की नौटंकी की जा रही है। इसका मतलब साफ है कि 13 करोड़ लोगों के नाम गलत काटे गए हैं। वर्ना चुनाव आयोग को छाती ठोंककर कहना चाहिए था कि किसी के नाम फिर से किसी भी कीमत पर नहीं जोड़े जाएंगे क्योंकि जो नाम काटे गए हैं, ठीक काटे गए हैं।
इसका तो यही अर्थ निकलता है कि बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव वोट काटकर जीते गये हैं इस कारण वहां चल रही सरकार अवैध है। तो क्यों नहीं बिहार और पश्चिम बंगाल की अवैध सरकार को भंग कर फिर से चुनाव कराए जाने चाहिए ? भारत के इतिहास में पहली बार मौजूदा राजनीतिक सत्ता पर वोट चोरी से बनी सरकार और चुनाव आयोग पर वोट चोरी करने का आरोप लगा है। इसके पहले बाहुबलियों पर बूथ लूटने के आरोप लगा करते थे। The vote is the foundation of our country. यानी सब कुछ वोट पर टिका है। वोट ही लोकतंत्र की बुनियाद है। वोट चोरी पूरे लोकतंत्र को अवैध बना देती है।
मोदी गवर्नमेंट के भीतर वोट चोरी को लेकर कोई शर्मोहया नहीं दिखती है बल्कि उसका इत्मीनान ही नजर आता है। हो यह रहा है कि सरकार की इत्मीनानी के बीच जनता की बेचैनी आ गई है। गोदी मीडिया और तमाम ऐजेंसियों के जरिए जेल जाने के जिस डर को परोसा गया उस डर के चक्रव्यूह को तोड़कर जनता बाहर आ चुकी है। सरकार जनता को पुलिसिया इंतजामात कर जंतर-मंतर पहुंचने से रोक तो सकती है लेकिन जनता के भीतर की बेचैनियों को ना तो बैरीकेट लगाकर रोक सकती है ना ही पुलिसिया इंतजामात के जरिए रोक सकती है। तभी तो जं जी के जरिए जनता की ये आवाजें गूंज रही है। ये पुलिस हमको कब तक रोकेगी ? हम कल फिर आयेंगे। इसी अंदाज में आयेंगे। जोश के साथ आयेंगे। इसी जज्बे के साथ आयेंगे। हम भागने वाले नहीं हैं।
एक बात तो साफ है कि जब सत्ता के पास जनता के सवालों का कोई जवाब नहीं होता है तो वह जवाब के नाम पर जवानों को उतार देती है। कह सकते हैं कि यह जनता की अभिव्यक्ति की आजादी का नहीं सरकार की अभिव्यक्ति की आजादी का दिन है। यह भी साफ तौर पर दिख रहा है कि मौजूदा राजनीतिक सत्ता चाहे जितने जुल्मों सितम कर ले लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है, क्योंकि इसकी जिम्मेवारी युवाओं ने अपने कांधे ले ली है। यानी एक तरफ सब कुछ खत्म करने का ऐलान है तो दूसरी तरफ सब कुछ खत्म नहीं होने देंगे का ऐलान है। अब अगर गिर गए तो ऐसी गहरी खाई में धकेल दिए जायेंगे, जहां से कोई देवता भी निकाल नहीं पायेगा। बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई विदेशी युनिवर्सिटी भी काम नहीं आयेगी। यह लोकतंत्र को बचाने और लोकतंत्र को श्मशान में बदल देने की लड़ाई है। दो विचारधाराओं में बंटी जनता को तय करना है कि वह किस तरफ है।
युवाओं के विरोध प्रदर्शन को लेकर मोदी गवर्नमेंट द्वारा दिल्ली आने वाली सैकड़ों ट्रेनों को रद्द करने और दिल्ली की लाइफ लाइन बन चुकी मेट्रो को बंद कर देने पर सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत की जिस तरह की (मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल ठीक नहीं) टिप्पणी वायरल हो रही है वह स्पष्ट संकेत दे रही है कि उनके भीतर देश के युवाओं को लेकर कितनी नफरत भरी हुई है। पहले युवाओं को काॅकरोच कहा अब कह रहे हैं मक्खी। मतलब सुप्रीम कोर्ट से कोई भी उम्मीद करना बे-ईमानी होगी ।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
