(suryanshtimes)balaghat2014 के पहले देशभर में मौजूदा राजनीतिक सत्ता को लेकर जबरजस्त अविश्वास था और उसको जिस तरह से भंजा कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा किया और पांच साल बाद हुए आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में ही बीजेपी ने सत्ता में वापसी की तो किसी भी देशवासी ने यहां तक कि खुद बीजेपी, आरएसएस या कहें खुद नरेन्द्र मोदी, तथाकथित नंबर 2 कहे जाने वाले अमित शाह और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी कि दसवां बीतने के साथ ही मौजूदा राजनीतिक सत्ता का तेरहवां होने के हालात बनने लग जाएंगे। यह भी सोचा नहीं गया होगा कि जिसको पप्पू साबित करने के लिए पानी की तरह पैसा बहा कर प्रोपोगंडात्मक रवैया अख्तियार किया जा रहा है वही पप्पू एक दिन पप्पा की तरह रास्ते का कांटा बनकर सामने खड़ा हो जाएगा।

भारत के इतिहास में ऐसी एक भी नजीर नहीं मिलेगी कि किसी भी राजनीतिक सत्ता पर आरोप लगा हो कि वह वोट चोरी करके राज कर रही है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा हुआ व्यक्ति वोट चोर है। ऐसा भी नहीं हुआ कि किसी भी प्रधानमंत्री के लिए “वोट चोर गद्दी छोड़” का नारा कभी किसी विपक्षी पार्टी तथा युवाओं ने खुले तौर पर सड़कों पर लगाया हो। जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक एक भी प्रधानमंत्री पर यह आरोप नहीं लगाया गया कि वह “लोकतंत्र के हत्यारे” हैं । इतना ही नहीं हिन्दुस्तान के इतिहास में एक भी नजीर ऐसी नहीं मिलेगी जहां चुनाव आयोग के चीफ इलेक्शन कमिश्नर को कटघरे में खड़ा कर उसका इस्तीफा मांगने के लिए विपक्षी पार्टियों के साथ देश का नौजवान सड़कों पर संघर्ष करने उतरा हो। देश की सरकार और देश का चुनाव आयोग जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोता चला गया हो। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौर में यह सब कुछ संभव हो गया है।
विपक्ष और देश का युवा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा और प्रधानमंत्री, गृहमंत्री की जबावदेही तय करने के लिए संसद से सड़क तक संघर्ष करते हुए दिख रहा है। पिछले कुछ सालों से भारतीय संविधान का कस्टोडियन और उसकी व्याख्या करने वाला सुप्रीम कोर्ट भी मौजूदा राजनीतिक सत्ता के आगे कहीं ना कहीं कम्प्रोमाइज्ड होने का अह्सास कराते हुए नजर आता है ! यानी आज के दौर में सुप्रीम कोर्ट भी अपनी विश्वसनीयता खोता चला जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता, तत्कालीन सीईसी राजीव कुमार के क्रियाकलापों से देश के भीतर जो हालात वर्तमान में विद्यमान हैं उनके लिए कहीं ना कहीं सुप्रीम कोर्ट को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और खासतौर पर मौजूदा तथा पिछले दो तीन चीफ जस्टिस आफ इंडिया को ! क्योंकि इन्होंने मर्ज का समय रहते उपचार करने के बजाय उसे पाल-पोस कर नासूर बनने दिया।
इस समय विपक्ष के नेता के निशाने पर सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हैं और इसका खुले तौर पर जिक्र करने में एलओपी को कोई हिचकिचाहट नहीं होती। मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी पर सवालिया निशान और ज्यादा गहरे तब हो जाते हैं जब आरोप तो चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाया जाता है और बचाव करने के लिए खुद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं आते बल्कि उनका बचाव करने मोदी सरकार के मंत्रियों और बीजेपी के प्रवक्ताओं की फौज खड़ी हो जाती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता की की खलनायकी के साथ कदमताल करने के कारण मौजूदा राजनीतिक सत्ता भी खलनायकी के दायरे में आकर खड़ी हो गई है। शायद इसीलिए सरकार कुछ कर पाने की स्थिति में आ नहीं पा रही है। चुनाव दर चुनाव जीतने के बाद बनने वाली साख इस दौर में डगमगाई हुई है। इस साख के डगमगाने की सबसे बड़ी वजह दिखावे के लिए ही सही सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई वह मोहर है जिसके जरिए चीफ इलेक्शन कमिश्नर के साथ बाकी दोनों सहयोगी इलेक्शन कमिश्नर, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर, आयोग की अधिकारी सीमा खन्ना और सेंट्रल गवर्नमेंट को नोटिस थमा कर जबाव मांगा गया है।
कानून मंत्रालय इस पशोपेश में है कि वह क्या जबाव दे। वह यह लिखकर तो दे नहीं सकता है कि उसके चुनाव आयोग के साथ भीतरी ताल्लुकात रहे हैं और हैं। वह तो यही लिखकर दे सकता है कि चुनाव आयोग ने जो भी काम किया है अपने तौर पर किया है। सरकार का उससे कोई लेना देना नहीं है। एसआईआर को लेकर चीफ जस्टिस आफ इंडिया ने चुनाव आयोग और केन्द्र सरकार पर फिलहाल जिस तरह की टिप्पणी की है वह कोई पहली बार नहीं की गई है। इसके पहले बिहार और पश्चिम बंगाल बंगाल के चुनाव से पहले भी कमोवेश इसी तरह की टिप्पणियाँ की गई थी लेकिन नतीजा सिफर रहा है। यानी कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग और मौजूदा राजनीतिक सत्ता को बनाये रखने के लिए चीफ जस्टिस आफ इंडिया का आशीर्वाद मिलता रहा है ! इसलिए देश को ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत कोई ऐसा आदेश पारित कर देंगे कि चुनाव आयोग सीईसी और मौजूदा राजनीतिक सत्ता पर कोई गाज गिर जाए।
मोदी सत्ता के सामने यह संकट भी खड़ा हो रहा है कि अब उन्हीं की पार्टी के विधायक सांसद कहने लग गये हैं कि एसआईआर के जरिए की गई हेराफेरी में इतनी ज्यादा हेराफेरी कर दी गई है कि उनके सामने ही संकट खड़ा हो गया है। जंतर-मंतर पर गांधीवादी तरीके से किए गए प्रदर्शन पर अमानवीयता की सारी हदें दिल्ली पुलिस ने पार कर दी थी और वह खुद कटघरे में आकर खड़ी हो गई थी तथा जबावदेही से बचने के लिए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को लंबे समय तक संसद के सदन से नदारत रहना पड़ा था। खबर है कि शायद इसलिए अब नौकरशाही की तरह पुलिस भी हर तरह की कार्रवाई करने का लिखित आदेश मांगने की सोच रही है।
बात सीईसी ज्ञानेश के इस्तीफे से आगे बढ़ती हुई दिख रही है क्योंकि विपक्ष और काॅकरोच जनता पार्टी का कहना है कि वे सीईसी ज्ञानेश के इस्तीफे के बाद भी रुकने वाले नहीं हैं। तो क्या सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता मोदी सरकार के लिए गले की फांस बन गये हैं ? बीते बारह बरस में मोदी सत्ता ने तमाम इंस्टिट्यूशंस के साथ जिस तरह से खिलवाड़ किया, जिस तरह का करप्शन और नेक्सेस सत्ता के साथ जुड़ा उसको लेकर अब संविधान के दायरे में खुलकर सवाल किए जाने लगे हैं। बात तो यहां तक चली गई है कि अब प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं केवल सूचना दी जाएगी क्योंकि यह हमारा अधिकार है। आप मना करिए चाहे मारिये हम नहीं रुकेंगे। आप हमें मार भी डालोगे तो भी हम गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे।
बीते बारह बरस से जिन ऐजेंसियों के जरिए गवर्नेंस के तौर-तरीके अपनाए गए अगर वही ऐजेंसियां लिखित आदेश के बिना काम करने से हाथ खींचने लगेंगी तो फिर आदेश देगा कौन ? क्या सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता खुद इस्तीफा देंगे ? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता से इस्तीफा देने को कहेंगे ? सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफा सुप्रीम कोर्ट आदेश आने के बाद होगा भी या नहीं होगा ? देखने में तो यही आया है कि चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत ने अभी तक सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता को जिस तरह से अभयदान दिया हुआ है उससे तो नहीं लगता है कि सीईसी का इस्तीफा होगा। इसे समझने के लिए पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव के पूर्व और होने जा रहे उपचुनाव में वोट डालने से वंचित किए जा चुके मतदाताओं के मताधिकार को लेकर की गई टिप्पणी ही काफी है “अगले चुनाव में वोट डाल लीजियेगा” “उपचुनाव ही तो है”।
वैसे सत्ता में बने रहना मोदी-शाह बीजेपी, भागवत और आरएसएस की मजबूरी बन गया है क्योंकि शायद उन्हें इस बात का अह्सास हो गया है कि जिस दिन भी सत्ता जाएगी वो कहीं के नहीं रहेंगे ! ना बीजेपी बचेगी ना संघ बचेगा ! इसलिए चाहे जो भी हथकंडे अपनाने पड़ें अपनाए जाएं किसी भी सूरत में सत्ता नहीं जानी चाहिए। विपक्ष जिस तरह से हाथ पैर मार रहा है उससे यह संदेश भी जा रहा है कि जनता के लिए वो अभी भी सड़क पर उतर कर जनता से कदम नहीं मिला पा रहे हैं। राजसी ठाठ-बाट के साथ सात सितारा होटल में लंच करने के बाद एसी बसों में चल रहे हैं और जनता धूप में पैदल चलकर पसीना बहा रही है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
