(suryanshtimes)बालाघाट जिले की पार्श्वभूमि की धूमिलता में यदि प्रतिभाशाली व्यक्तित्व, अज्ञात संगीत एवं कलाप्रेमी, जनगायक, कवि, नाटककार, कहानी लेखक, अध्यापक, व्यग्यकार और सर्वोपरि एक शिक्षा संगठक के रूप में यदि किसी एक व्यक्ति की खोज की जावे तो वे होंगे स्व दादूलालजी उपाख्य दिनेश पारीवाल, आपका जन्म 4 जून 1906 को वारासिवनी के एक बहुत ही गरीब विश्वकर्मा परिवार में हुआ पिता का नाम श्री जगलीन लाल पारीवाल तथा माता का नाम सावित्री था प्राथमिक चार वर्षों कक्षाओं के पास करने के पश्चात पिताजी की कम आमदनी के कारण एक दो साल इनका यूंही बीता आखिर बालक दद्दू या दादूलाल के स्वंय स्पूर्त प्रयासों से अपना नाम शासकीय हाईस्कूल बालाघाट में लिखवाकर ही छोडा अपने मर्जी के विरूद्ध पुत्र को आगे पढ़वाने का काम पिता को असंभव नहीं तो दूभर अवश्य हो गया जहां एक ओर बाप गरीबी के कारण बालक को आगे पढ़ाने में पस्त हिम्मत होते वहां बालक उत्साह के साथ शासकीय छात्रवृत्ति ने इनके आगे के अध्यन को गति और बल दिया।

इनकी विशेषता का परिचय तो पास पड़ोस के छात्रों और शिक्षकों का संभवत मित ही चुका था आपने जो पहली तुकबन्दी अपने नवमें साल में की थी वह इस प्रकार 7-

सबरी प्रजा सुखी हो आज। हमरे पंचम जार्ज महाराज। इंगलिस्तान है उनका देश। हुए सप्तम एडवर्ड के नरेश। तनमन प्रजा सुखी हो आज। हमरे पंचम जार्ज महाराज।

दूसरी तुकबन्दी जो इन्होने पांचवी कक्षा में की थी वह वर्षा ऋतु के आगमन क. स्वागत है-

विगत गई है ग्रीष्मऋतु, जो हाहाकार मचाई थी।

जो जग में निजपद को धरके अतिउत्पात मचाई थी।

हुआ आगमन वर्षाऋतु का, शोभा इसकी न्यारी है।

ब्रम्हा की गति न्यारी है।
इनकी तीसरी तुकबन्दी देखिये-

क्या नाचेंगे सागर नभ में, चंदा को पाकर अविकल ।

क्या नाचेगा मोर देखकर, वर्षा के काले बादल।

क्या नाचे मदहोश देख, साकी के हाथों की हाला।

नाच रहा पागल किसान लख, ओर क्षोर की हरी फसल। आज जवानी का नसनस में, फिर आया है नया असर

आज हो गई सीधी उसकी, वर्षों की झुकी कमर आज फिर गया है उसके, चिर-सुखे चेहरे का पानी

देने को आर्शीवाद सब, आज आ गये देवपितर।

इसके पश्चात तो हाईस्कूल जीवन बालाघाट जैसे स्थान में रहते हुये भी काफी उर्वर रहा एक साल पश्चात ही आशु समस्या पूर्ति-

केहि कारण फूल फली न चमेली।

15 मिनट में ही पूर्ति कर स्वनाम धन्य श्री कन्हैयालाल जी अधिवक्ता से प्रत्येक पंक्ति पर एक रूपये के अनुसार आठ रूपये पुरस्कार पाये। इसके पश्चात आपकी लेखनी में विशेष ओज़ आने लगा। आठवी कक्षा में आपने पहला नाटक “धुव्र-चरित्र” लिखा जिसके सूत्र का बसन्त वर्णन इस प्रकार है-

रंग बिरंगे पशु पक्षी लतादिक, बेला चमेली दूध मोंगरा अनार है। जाई जुही, मोतिया गुलाब केवडा आदिक, चम्पा मोरसीली, यशवन्त व कनेर, है। कदली अम्ब अम्बिया कदम्ब सेवा नाशपाती, लीची अनास अंगूर कचनार है। चातक चकोर मोर कोकिल हंस श्रृगादिक, होवे आनन्द जस बसन्त की बहार है।

कक्षा नवमी में आपका लिखा “गुलाम भारत” हस्तलिखित प्रति उपलब्ध नहीं है। उस समय की अर्धखिली कली का भी मजा लीजिये-

सम्हलकर पुष्पित होना कली,

निकट है पुष्पराज का वास। इधर है जल का कीड़ा कुण्ड, पध्मिनी का शरीर के सहवास। चकवा के दुख की टेर, षिषिर की उसने पाली ठण्ड।

कठिन हिम-आलय नीर,
हाय करत नुपूर बिरह प्रचण्ड। संभलकर पुष्पित होना कली, कठिन है जीवन का भाग। जिधर भी पड़ जावेगें पैर, उधर ही लग जावेगी आग।

एक और :-

प्रेम :-

तुम न आये दीप जलता रह गया। दिन बीता विकल मन से. सांझ से दीपक जलाया। नीड़ में खग सो गये, अन्तिम बटोही लौट आया। थी उनींदी तारिकाये, चांद ढलता रह गया तुम न आये थक चुकी आशा निराशा, बुझाकर अन्तिम पहेली। दे रही थी साथ मुझको, यामिनी नभ में अकेली। मुझे मेरी भावना का, राज खलता रह गया तुम ना आये. मिल ना पाये एक सरिता के अभागे दो किनारे छोड़ दी विश्वास की नौका तुम्हारे ही सहारे किन्तु नौका को किनारा हाय छलता रह गया- तुम ना आये……… रात से जब ले चुके अंतिम बिदा नभ के बटोही हृदय रोया किन्तु दृढ़ विश्वास कर आंखे ना रोई आंसुओं से किन्तु वह विश्वास गलता रह गया- तुम नां आये……
संभवतः आप पच्चीस वर्ष के रहे होगें आपने भक्त सूरदास में विल्व मंगल का काम किया था। आपने संवाद, स्वलिखित भाषण और गीतों की स्वरलहरियों से समस्त दर्शकों को रुला दिया था, जिसके परिणाम स्वरूप श्री देवीचरण निर्गुण ने आपको स्वर्णपदक दिया था।

इसके पश्चात आपका महाविद्यालयीन जीवन आरंभ हुआ विशेष आर्थिक पकटमय रहा। आपका रंगमंच पर आने वाला पहला नाटक “दिग्दर्शन” हिस्लाप कालेज के रंगमंच पर अभिनीत हुआ, जिसमें सर्वश्री भवानी शंकर पचौरी, जर्नादन वेडेकर, अवकाश प्राप्त डिष्टी कमीश्नर नरेन्द्रनाथ पान्डे चिन्तामनराव ओतलवार वीरेन्द्रकुमार रायजादा, रामगोपाच पुजारी, तथा उमाचरण दुबे जैसे ख्याति प्राप्त व्यक्तियों ने भाग लिया था। आपको पुन स्वर्णपदक एवं इंक्वान रूपयों की पुस्तकों का पुरस्कार मिला था। तब से आप रंगमंच के चर्चित व्यक्ति हो गये। मारीस कालेज में बी.ए. कक्षाओं में रहते-रहते उन दिनो के प्रसिद्ध अभिनेता “बेजामीन”, रघुवीर सावरकर, तथा सोहराब मोदी के सम्पर्क में आये।

मौत की रात, पाषविक पिपासा, अमृत या विष, आदि नाटकों की व्यवसायी नाटक मंडली द्वारा मांग बढ़ने लगी। नाटक मंडली के प्रमुख अभिनेता बेजामीन, रघुवीर सावरकर, तथा सोहराब मोदी साथ रहकर लखनऊ, इलाहबाद, कानपुर, झांसी बम्बई में उपरोक्त नाटकों का स्टेज प्रोग्राम किया। काफी समय तक अभिनेता सोहराब मोदी के साथ रहे। सोहराब मोदी कि फिल्मों के लिये गीत तथा संवाद लेखन में किसी और का नाम चित्रपट पर आने के कारण इनके मानसिकता पर एक जबरदस्त ठेस लगी। ऊड़ी समय स्पेंशट्रेनींग कालेज जबलपुर के लिये बी.टी. का चुनाव होने के कारण आपको दिशा बदलनी पड़ी।

यहीं से आपके जीवन की दिशा बदली। एक नाटककार एक शिक्षक में जो गया वैसे तो 25 अगस्त 1930 को वारासिवनी में आपने एक मिडिल स्कूल केवल चार लड़कों से प्रारंभ कर चुके थे तथा तहसील के गांव गांव से आर्थिक मदद प्राप्त कर वर्तमान “टिहली बाई हायर सेकेन्डरी स्कूल को आधा बनावा लिया था। जब राय बहादुर साहब पश्चात रायबहादुर पं. बिहारी लाल ने शेष भाग को अपने स्वयं के खर्च से बनवाकर श्री प्रारीवाल को शैक्षिक स्वपन्न साकार करने की ओर अग्रेषित किया। अध्यापन के साथ साथ नाटक लेखन और दिग्दर्शन सम्हालते सम्हा रहे। ततपष्चात आपने सारा बल अध्यापन कार्य में दिया तथा लेखन गौण कर दिया।

आपकी अध्यापन की दिशा भी गौरवशाली न रही। भाऊ थानसिंग बिसेन पूर्व विधायक के शब्दों में चार लडकों की घुड़साल से लगभग 1961 के अपने अवकाष प्राप्ति के काल तक ड्रेढ़ हजार छात्रों तथा अर्धशतक शिक्षकों की बेमिसाल संस्था गढ़ना यह श्री दादूलाल पारीवाल का ही काम था। आज टिहलीबाई हायर सेकेन्डरी स्कूल की इमारत का कण कण इनके खून और पसीने से सना है।

आप वारासिवनी नगर तक ही सीमित न रहकर अपने शिक्षा प्रसार कार्य जिले के कोने कोने में विस्तारने लगे। परिणामतः कंटगी में जनता हाई स्कूल आज का शासकीय हायर सेकेन्डरी स्कूल, इसी तरह लांजी, लालबर्रा, लामटा, नेवरगांव, मेहन्दीवाडा, के शासकीय उच्चतर, बम्हनी तथा अन्य माध्यमिक शाला में आपके अनावरत परिश्रम के ही फल है पर आपकी सर्जन कारिणी शक्ति को नगर के दिग्गज अशिक्षा प्रेमियों ने समाप्त करने कोई कसर बाकी न रखा।
जैसा भी हो आप अपने कठोर तपस्या से बनाई हुई संस्था में इच्छानुसार न रह सके। संस्था को नगरपालिका को हस्तान्तरित करने के पश्चात अपने रमे थमे जीवन स्थती से उखाड़ फेंककर मिसाले शरणार्थी के घर का न घाट का कर दिया। परन्तु आपकी अपूर्व कर्मठता ने यह चुनौति भी स्वीकार की, पुनः नया जोश आया और दूसरे ही सन 1962 में अनेकों रोडे, और विपदाओं के आते हुये भी “सेठ परमानन्द स्वरूपचंद कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय की स्थापना कर स्वयं उस समय के जिलाधीश श्री पी.एन. अब्बी को चमत्कृत कर दिया, जिन्होने वारासिवनी में महाविद्यालय के मनसूबे को व्यर्थ और असंभव करार दे दिया थां चार साल चलने के पश्चात वहां की प्रबंध कारिणी समिति में भी दरार पड़ गई 30 जून 1966 को वह महाविद्यालय समाप्त हुआ और 1 जुलाई 1966 याने दूसरे ही दिन स्व. विपीन लालजी पटेल के दान से शंकरवाव पटेल कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय वारासिवनी को पुनः संभवकर बता दिया। आप यहीं के संस्थापक प्राचार्य रहे। महाविद्यालयीन भवन का निर्माण भी दूसरे सत्र से आरंभ कर दिया। अप्रैल, मई, जून की दोपहरी लोग अपनी ठण्डी छावों में बिताते रहे, पर श्री दादूलाल पारीवाल पैदल ही एक छत्ता लगाये ईट बनाने वाले कारीगर के ठीये पर जाकर कार्य की प्रगति देखते रहे।

इसके अतिरिक्त आप कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय खुरई के भी सूत्रपातकर्ता तथा अरण्रूभारती कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के संचालक रहे।

आपके षिक्षा प्रेम के 1968 और 69 के नवीन संस्करण कमशः उच्चतर माध्यमिक शाला सोनपूरी, उकवा, तथा मिरगपुर है। शेष जीवन के लिये आकांक्षाओं की पिटारी लबालब भरी रही, पर सर्जन शक्ति को क्षेत्र के ही गणमान्य लोगों ने एक संस्थापक प्राचार्य को अलग कर नवगठित “आयुर्वेदिक महाविद्यालय” वारासिवनी की जो लगातार तीन वर्षों तक चलने वाली कक्षाओं की मान्यता समाप्त करवा निर्मित भवन की एक-एक इंट निकलवाकर अलग करवा दिया।

वैसे साहित्यिक पर अध्यापक हावी होने के कारण आपकी गंगा यमुना साहित्यिक धारा क्षीण हो जाना संभव था, किन्तु तिस पर भी आपने माखनचोर, सिंहगढ़ नगरपालिका, सलमा, चेचकराज, आदि नाटकों को जन्म दिया। कविताओं और कहानियों का भी अम्बार है। लगभग दो दर्जन पाठ्य पुस्तके लिख डाली है, जिसमें विज्ञान और संस्कृत भी सम्मिलित है।

जिले के और आसपास के आप लोकगीतों के लिये विशेष प्रसिद्ध है। आपके कुछ लोकगीत का अंग्रेजी अनुवाद हो चुका है। जो-

“सांग्स ऑफ दी फारेस्ट” नामक पुस्तक में संग्रहित है उक्त संग्रह लन्दन में प्रकाशित

हुआ है।

स्वाधीनता संग्राम के दिनों में जिन कान्तिकारियों ने अंग्रेजी शासन की बगावत की थी, उन कान्तिकारियों के बारे में सन 1942 में ” आजादी की लडाई” नामक वीर रस से ओत प्रोत आल्हा अपनी लेखनी से प्रकाशित कर कान्तिकारियों का हौसला बुलन्द किया था।

स्वतत्रंता के सिपाहियों के विषय में वेदना से प्रस्फुरित रचना आपके जीवन में जो आन्तरिक वेदना प्रस्फुरित हुई वह निम्नाकिंत रचना से अवगत होता है-
कितने तारे उस अर्धरात्रि में, चमक हुए नम में विलीन।

जग नहीं ढूंढता निज निधियां, निधियां ही जग की करें खोज।

घर के बिकते है बेलपत्र, वन के मुरझाते है सरोज।

सम्पन्न वहीं होता है जो, सुविधा से लेता रत्न बीन कितने तारे कितने उस मानसरोवर में, अज्ञात बिचरते है मराल।

पर कृमिभक्षी शुभ नील कण्ठ, दर्शन कर होते निहाल।

उस महारण्य में कितने खग, जो स्वर में कोकील से प्रवीण। कितने तारे उन मुकुलों का क्या कहें, कि जिनकी सुषमा का हो गया अन्त।

रौदें जाने से पहले, जिनने, देख न पाया मधु-बसन्त ।

उन रागों का क्या कहें, कि, तारों पर न ला सकी जिन्हें बीन ।.. कितने तारे – स्वतंत्रता के सिपाही

प्रणाम उनको कहो हमारा, स्वतंत्रता के जो थे सिपाही, सहा था आजीवन जेलखाना, मुसीबतें, भुखमरी, तबाही। मनुष्य या तो वे देवता थे, वे सच्चे मानों में थे फरिश्ते। अजब ये जीने के ढंग उनके, अजब थे मरने के उनके रस्ते। पले भयानक दरिद्रता में, जले तो ज्वालामुखी फटकर। न आये आंखों में उनके आंसू, चढे तो फांसी पर हंसते-हंसते निकलने पर दम न उनके चेहरे पर, उफ की कुछ शिकन न आई।

प्रणाम-
न इनके रहने का कोई घर था, न इनके बराने की कोई बस्ती। घरों का छप्पर था मंहगा, सजायें लम्बी थी इनको सस्ती। पुलिस से इनका था खूब रिष्ता, कठोर हथकडियां इनकी बहन। स्वतंत्रता की महान बहनों में, उन्हें भी मिटाने की थी एक मस्ती। थे काल कोठरियां इनका मैका, वो जेल बैरक से थी सगाई।

प्रणाम

न बाप मां की थी याद इनको, न बाल बच्चों ही की फिकर थी। न बाप मिल सकते मरते मरते, न मां ही मिल सकती मरती मरती मरी थी औरत बिना दवा के, नसीब बच्चों को न कफन था। कठोर दिल के हुये थे टुकडे, मिली जब दोनों को एक अरथी। बची बहन का निकल गया दम, था जेल में बंदी उसका भाई।

प्रणाम-

अन्य-

मशीनगन से बतनपरस्तों पर गोलियां दी यही तो बरसा। तमाम आलम चूल्लूभर पानी को मरते मरते यही तो तरसा। यहीं थे लाशों के ढेर जिनपर फिरंगियों के चढे थे घोडे। यहीं तो लोहू कराह चीखे ले, बह रहा था नदी नहर सा। यही वतन के गले चमन की कली वे फुलों की खार होगी। यह वह जमीं है जहां शहीदों के खून की निकली धार होगी। कदम उठाना सम्हल के राही। यहीं किसी की मज़ार होगी।

सन् 1966 के पहले लखनऊ रेडियों स्टेशन से अपनी प्रतिभा के कारण स्वरचित मरारी सेला” बड़ी मजेदार है खेड़ा” रे सारी दुनियां में बड़ी मजेदार है खेड़ा” लोकगीत ढोलक व मांदर की थाप पर गाकर अनहोनी को साकार किया था। आप नागपूर रोडियो स्टेषन में सन् 1946 से लेकर 1956 तक छत्तीसगढ़ी मरारी, पंवारी, गोंडी लोकगीतों और नाटकों के कलाकार रहे।

आपका हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, तथा स्थानीय छत्तीसगढी, मरारी, पंवारी, गोन्डी, आदि पर समान अधिकार रहा है। देवनागरी उर्दू में आपकी हुब्बे वतन से शराबोर” तुमको मेरा सलाम, आपकी आधुनिक कृति है।

गोकुलम, साकेतम, नवनीत, चौर, भारत दर्शनम, ऋतुमंगलम, हरिश्चंद्र नाटकम, आदि नाटक संस्कृत नाटक हैं। तं पुण्य भारतं वन्दे, शीर्षक से आपकी संस्कृत रचना, ऑल इंडिया रेडियों से प्रसारित किया गया था।

आपके गीत एवं कवितायें संस्कृत विद्वानों को जयदेव की लालित्य एवं सारल्यपूर्ण शैली की याद दिलाती है।
वार सांग्स आफ काश्मीर अंग्रेजी की विशेष प्रेरणापद काव्य- कृति है।

बाल मनोवैज्ञानिक वातावरण और आधुनिकता को समरस कर विशेष दक्षता ऐसा प्रारंभिक संस्कृत साहित्य प्रस्तुत किया है जो हमारे नन्हें मुन्नों को और जनसाधारण को अपनी ओर खीचे बीना नहीं रह सका है। आपने बाल एवं जन सरल संस्कृत साहित्य एजे संस्कृत न समझने वाली खाई को पाटा है। इनके द्वारा रचित संस्कृत भाषा में गाये जाने वाले लोकगीत लोक मंचों में गाये जाते है-

आपने संस्कृत भाषा में-

वाणी वंदना, गणेश वंदना, कामना, भारत नू, ग्राम देवता, हेमात, ग्रामवर्षा, ग्राम क्षेत्रमाला, ऋषि मंगलम्, ग्राम मधुरिमा, मंगल तुर्यः, वर्षामंगलम्, वर्षावतरणम्, गोरस याचना, सम्बोधनम्, ताडनम्, नृत्यनिमंत्रणम्, वनविहारम्, एकाकिनी, रूपगविता, शंकरकर, एवं शंकर क्षेत्र, गलियारों और राज्यों की पगडंडियों तक। संस्कृत जनभारती, पुस्तक का सफल प्रकाशन जारी है।

सरलतम संस्कृत में बाल जनगीत, नाट्यनृत्य, प्रहसन आदि मचीकरण कर विशेष सफलता प्राप्त की। आपकी संस्कृत भाषा में प्रथम चित्रपट निर्माण करने की अभिलाषा थी।

सरल संस्कृत गीतों ने यह सिद्ध कर दिखाया कि ये उतनी ही गल उतरती जितनी कि कव्वलियां और ध्वनि चित्रों के माध्यम से फिल्मी गीत उतरते। गांवों के चौपालों में आज भी ये गीत झांझ मंजीरे, ढोलक की थाप पर गाये जाते है। संभागीय स्तर पर कलापथक के माध्यम से संस्कृत प्रचार एवं प्रसार कर देश निर्माण में योगदान दिण।

आपने तपोवन विद्यापीठ का निर्माण इसी एक प्रधान लक्ष्य को लेकर किडा था। आयुर्वेद महाविद्यालय और प्राप्त शोध संस्थान इसके अनुसांगिक लक्ष्य रहे है।

श्री दादूलालजी “दिनेश” पारीवाल को पिछले 25 वर्ष के लम्बे अभियान में इन्हें प्रथम सफलता के दर्शन तब हुये जब संस्कृत कवि, कुल शिरोमणि महाकवि कालीदास की उज्ययिनी के रंगमंच पर छात्रों द्वारा “साकेतम” ने लगभग दस हजार दर्षकों को मंत्रमुगध कर दिया। तबसे इनके संस्कृत गीतों के टेप के बेशुमार प्रर्दशन विभिन्न भागों में होते रहे।

दिल्ली, वाराणसी, हरिद्वारा, भोपाल, सागर, जबलपुर आदि नगरों में अनेकों प्रदर्शनों ने न केवल भूरी भूरी प्रशंसा ही मिली अपितु संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान डॉ. मंटन मिश्र, डॉ. सत्यवत दिल्ली, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी हरिद्वार, डॉ. रामजी उपाध्याय, डॉ बटुकनाथ शास्त्री वाराणसी, डॉ. त्रिलोकधर द्विवेदी जबलपुर के साधूवाद श्री दिनेश पारीवालजी के विषेषप्रगति के पाथेय रहे। संस्कृत, पाली, प्राकृत के धुरंधर विद्ववान दिवंगत डॉ. हीरालाल जैन ने तो श्री दादूलालजी दिनेष पारीवाल की शैली की समता और सारज्य देखे।

शंकरसाव पटेल उपाधि महाविद्यालय से अवकाश प्राप्त लेने उपरान्त आपकी हार्दिक इच्छा रही कि वारासिवनी व बालाघाट के बीच ग्राम डोंगरिया में जिसके लिये जमीन भवन निर्माण के लिये तलाश ली थी कि वे अपने अन्तिम चरण में “बैनगंगा यूनीवर्सीटी” को खोलकर आने वाली पीढ़ी के लिये जिले के अतिहास के लिये एक नया
पृष्ठ खोलना, पर साकार न हो सका और 10 जून 1989 को अपने ही द्वन्स’ जय बालाघाट” में लिखित गीत के अनुसार-

बस खुश रखो मेरे प्यारे जिले, तेरी ही गोद मुझको हरदम मिले।

तुम पर ही मेरी बिछे अंतिम खाट। जय बालाघाट मेरे जय बालाघाट।

“बहारे फिर भी आयेगी, न फिर दादूलाल “दिनेश” होंगे।

न होगी वो ही रातें, न फिर वैसे ही दिन होगें।

किसी की भी कमी जग में, न होगी और होती है।

भले बुलबुल नई गावे, न पर गुज़रे चमन होगें।

लगे फिर उस दरे दौलत पे, चाहे महफिलें वैसी।

मजे के दौर फिर वे हों, न पर वैसे जतन होगें।

प्रस्तुतकर्ता

कालिन्दी मोहन पारीवाल

(दस्तक से साभार)

योगेश चौबे सीनियर अधिवक्ता प्रेम नगर बालाघाट द्वारा संकलित9425138595

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