बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर में हम चीन पर निर्भर हो चुके हैं। हमारी अपनी प्रोडक्शन कास्ट से कम दाम पर चीन का माल मिल रहा है इसलिए देश की इंडस्ट्रीज द्वारा चीन का माल लेकर उस पर अपनी मोहर लगाकर देश के बाजार में बेचा जा रहा है। यानी रोजगार गायब हो चुका है। ह्यूमन रिसोर्स को लेकर कोई रास्ता बचा ही नहीं है। डिफेंस सेक्टर में भी अडानी और अम्बानी की एंट्री हो चुकी है। मतलब देश में अब कोई भी क्षेत्र सेंसेटिव नहीं है। भारत सरकार खुद को ओपन बाजार में खड़ा कर चुकी है। वह किसी भी क्षेत्र में कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। जं जी, जं अल्फा सोच रहा है सरकार जिम्मेदारी ले लेकिन सरकार सोच रही है जिसके पास पैसा है वह उस पैसे के आसरे जिस भी क्षेत्र को चलाना चाहे चला सकता है। हमने तो अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। हमको जनता ने चौकीदारी के लिए चुना है इसलिए अब हम जनता के लिए कोई काम नहीं करेंगे। हम तो केवल टैक्स बसूली करेंगे।

मतलब मौजूदा मोदी सत्ता ने तय कर लिया है कि अब वह देश को निजीकरण के जरिए निजी कंपनियों के हवाले कर सिर्फ चौथ की बसूली करेगी। सार्वजनिक उपक्रमों को डिसइंवेस्टमेंट के नाम पर बेचने के बाद मोदी सत्ता ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए तय किया है कि देश के हर मंत्रालय की पाॅलिसी को मोनेटाइज किया जाएगा क्योंकि हमें पैसा चाहिए और पैसे से राजनीति चलती है और राजनीति के आसरे देश की सत्ता बनती और बिगड़ती है। इस वक्त जं जी की आंधी ने देश के पाॅलिटिकल ट्रांसफार्मेशन को सोशल मुद्दों से जोड़ दिया है। सरकार जिस जमीन पर खड़ी हुई है उस जमीन पर उसके कदम थरथराने लगे हैं। 2047 तो बहुत दूर की कौड़ी है, 2029 तक ही शायद कोई ऐसा मंत्रालय बचे जहां प्राइवेटाइजेशन ना हुआ हो। तय है कि प्राइवेटाइजेशन करके सरकार पैसा लेगी और बोझ देश की जनता का बढ़ेगा। यह अलग बात है कि सरकार उस पैसै में से कुछ सम्मान निधि के नाम पर बांट दिया जाएगा बाकी गरीबों के लिए गरीब कल्याण अन्न योजना के नाम पर पांच किलो अनाज तो है ही।

मोदी सरकार पैसे के लिए बजट का पूरा भार प्राइवेट के कांधे पर लादने के लिए तैयार है। क्योंकि उसे जं जी, जं अल्फा और युवाओं की आंधी को रोकने के लिए एक ऐसी दीवार चाहिए जिससे जं जी, जं अल्फा, युवा के साथ ही विपक्ष की राजनीति बिखरती, टूटती नजर आए। जं जी के आंदोलन के पीछे कोई फंडिंग हो या ना हो लेकिन जं जी के आंदोलन को दबाने के लिए कार्पोरेट और सत्ता का नेक्सेस और पूंजी की दीवार खड़ी हो चुकी है। देश का जं जी भी अब इस हकीकत को भलीभांति समझने लगा है कि सत्ता गिराने के लिए पैसा चाहिए, सत्ता को बरकरार रखने के लिए भी पैसा ही चाहिए। और अगर सत्ता के पांव किसी आंदोलन से उखड़ने लग जाएं तो ज्यादा पैसा चाहिए। यानी देश की राजनीति में फाइनेंस का आस्पेक्ट इतना बड़ा हो चुका है कि उसी के जरिए हर सरकार के दौरान सत्ता और कार्पोरेट के नेक्सेस को लेकर सवाल उठते रहे हैं। करोड़ों रुपयों का जिक्र हवा में नहीं होता है।

सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी, पाॅलिसी के साथ सब कुछ देने की तैयारी, जब निजी हाथ किसी सरकारी उपक्रम को खरीदते हैं तो उसके लिए भी पैसा देश की जनता का ही होता है जो उन्हें बैंक से बतौर लोन दे दिया जाता है। इसके बाद सत्ता के पांव को जमाए रखने का खेल शुरू होता है। यानी फंडिंग के जरिए राजनीति को कैसे साधा जाता है यह अब देश का बच्चा बच्चा जानने समझने लगा है। जब चुनाव में मौजूदा राजनीतिक सत्ता पार्टी की हार होती है तो दिल्ली सल्तनत के इशारे पर किस तरह प्रीमियर जांच ऐजेंसियां सक्रिय होती हैं और पैसे और राजनीति का नेक्सेस कैसे नंगा नाच नाचता है इसका नजारा पूरे देश ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश के साथ ही लगभग सभी राज्यों में देखा गया है।

लेकिन इस बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। कोई पालिटिकल मूवमेंट नहीं है। पहली बार नाॅन पालिटिकल सिचुएशन के बीच पालिटिकल सत्ता आकर फंस गई है। जिससे उसके पांव डगमगाने लगे हैं। तो उसने तय किया है कि पैसे का खेल खेलकर कुछ ऐसा किया जाए जिसमें देश का जं जी, जं अल्फा, युवा उलझकर रह जाए। यानी जिस जं जी ने मौजूदा राजनीतिक सत्ता के पांव डगमगाए हैं उसने फैसला कर लिया है कि अब नैरेटिव, परसेप्शन, चेहरा (दो चेहरों को छोड़ कर), पाॅलिसी सब कुछ बदलेगा। तो क्या जो फुसफुसाहट सुनाई दे रही है मंत्रीमंडल विस्तार की उसमें दो को छोड़ कर सारे चेहरे बदल जायेंगे ? ऐसा बिल्कुल नहीं है। उन्हीं मंत्रालयों में नये चेहरे दिखाई देंगे और उन्हीं मंत्रालयों में पुराने चेहरे बरकरार रहेंगे जिनमें कार्पोरेट दांव लगाएगा। मोदी सरकार कुछ इस तरह से फेस लिफ्ट होना चाहती है कि जो बारह बरस की यात्रा है उसमें आमूलचूल परिवर्तन करके नया मंत्रीमंडल बना दें लेकिन कैबिनेट के भीतर से ही यह कहते हुए विरोध के स्वर प्रस्फुटित होने लगे हैं कि जब आप चाहेंगे रखेंगे जब चाहेंगे हटा देंगे मतलब हमारी राजनीति का कोई महत्व ही नहीं है।

सवाल है कि बीते बारह बरस तो पूरी कैबिनेट मुरदावत बनी रही लेकिन अब यह बोलने की ताकत आ कहां से रही है ? हकीकत यह है यह ताकत आई है देश के भीतर सरकार को लेकर लगातार उठ रहे सवालों से जिनका उत्तर दे पाने की हालत में मोदी सत्ता बिल्कुल नहीं है। शायद इसीलिए वह देश के भीतर कार्पोरेट के जरिए अलग अलग जगहों पर मोटी लकीर खींचना चाहती है। इसीलिए निर्णय लिया जा रहा है कि मंत्रालयों द्वारा बनाई जाने वाली पाॅलिसी में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी होगी। यानी मंत्री और ब्यूरोक्रेसी के बगल में बराबरी से प्राइवेट की कुर्सी लगेगी। तय है इसमें भी लाभार्थी ही लाभ में रहेंगे। तो क्या वाकई बची हुई सरकारी संपत्ति प्राइवेट कंपनियों के हवाले कर दी जाएगी ? या फिर देश के भीतर हर मंत्रालय से जुड़े तमाम प्रोजेक्ट का संचालन निजी हाथों में होगा ?

सरकार को पैसा चाहिए यूपी इलेक्शन के लिए। सरकार को पैसा चाहिए उन विपक्षी और पक्ष के साथ खड़ी पार्टियों के उन सांसदों को साधने के लिए जो परिसीमन बिल के पक्ष में वोट डाल दें। वैसे भी जेडीयू, टीडीपी, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के साथ ही दूसरे राज्यों की राजनीति को क्या चाहिए ? इन सबसे जं जी, जं अल्फा, युवाओं का माइंड डायवर्ट करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कैबिनेट मंत्रियों का खिरका फिर से 2014 के खेलो इंडिया का जिक्र करने लग गया है कि ओलंपिक में कमाल करना है तो खेलना होगा । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा “किस बच्चे की किस खेल में रुचि है, कौन सा बच्चा किस खेल के लिए फिट है” । पीएम मोदी ने तो बच्चियों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए (इसमें वे बच्चियां भी शामिल हैं जिनके साथ जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस और उसके साथ मिलकर असामाजिक तत्व घिनौनी हरकतें कर रहे थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह गांधी के तीन बंदर बने रहे) कहा कि “मेरी प्रिय बेटियो जिंदगी एक पिच है और वक्त है गेंदबाज। बालर कभी स्पिन डालेगा, कभी गुगली तो कभी बाउंसर। लेकिन हमें इन परिस्थितियों में जीतने के लिए आलराउंडर बनना पड़ेगा।

नेक्सस अगर सिस्टम में बदल जाए और सिस्टम देश को उसी नेक्सस के आसरे चलाने लग जाए तो फिर उसे कौन भेद पाएगा ? क्योंकि देश की पूंजी जिन हाथों में है उसके सरोकार देश के सिस्टम से ना होकर नेक्सस के सिस्टम से हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौर के अंधेरे का एक सच यह है कि कई बड़े बिजनेसमैनों ने बैंकों से कर्ज लिया और देश छोड़ कर भाग गए। सरकार मशक्कत कर रही है लेकिन हाथ खाली है। दूसरी हकीकत यह है कि देश के बड़े बड़े बिजनेसमैनों को बैंकों ने कर्ज दिया। कर्ज के आसरे उन्होंने अपनी रईसी में कोई कमी नहीं आने दी लेकिन उनकी अपनी कम्पनी, इंडस्ट्री धीरे धीरे दिवालिया होने की दिशा में बढ़ने लगी लेकिन बैंक लगातार लोन देते रहे और एक स्थिति ऐसी आई जब उन बिजनेसमैनों ने हाथ खड़े कर दिए कि हमारे पास पैसा नहीं है तो हम बैंक का कर्जा नहीं पटा सकते हैं। तो मोदी सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था कर दी जो दिवालिया हो रही कंपनियों को राहत पहुंचाने का काम करेगी। नाम दिया गया नेशनल कंपनी लाॅ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) । और एनसीएलटी कंपनियों पर मेहरबान होकर चवन्नी में मामले को सैटल करने लगी। ऐसी सुनहरी व्यवस्था दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलेगी।

देश को तो अपने पैर पर खड़े होकर प्रोडक्शन बढ़ाना चाहिए, देश की हैसियत देश के लोगों के जरिए खड़ी होनी चाहिए लेकिन देश की इकाॅनामी कार्पोरेट और उसके नेटवर्थ के आसरे बताई जाती है कि प्रति व्यक्ति आय एक से तीन लाख के बीच है जबकि सच तो यह है कि सरकार के ही दस्तावेज़, नीति आयोग के डाक्यूमेंट बताते हैं कि देश की बान्नवे फीसदी आबादी को एक हजार रुपये से भी कम में जीवन जीना पड़ रहा है। 140 करोड़ देशवासियों के भीतर तकरीबन 500 लोग ऐसे हैं जिनके पास अकूत सम्पत्ति है। उन्हीं को देशवासियों की जमा पूंजी बैंकों ने बतौर कर्ज दी हुई है। जबकि उनके पास खुद का जेट है। दुनिया के अलग अलग देशों के शहरों में आलीशान दफ्तर हैं। यानी पांच सितारा जीवन है। इसके बावजूद बैंकों का पैसा यह कहते हुए नहीं लौटाया जाता है कि हमारी कंपनी दिवालिया होने की कगार पर आकर खड़ी हो गई है।

हाल ही में बीजेपी और आरएसएस के करीबी जी न्यूज को चलाने वाले सुभाष चंद्रा के बाइस हज़ार करोड़ रुपये को छै हज़ार करोड़ में सैटिल कर दिया गया। यह बात अलहदा है कि विरोध के स्वर उठने पर मामले को होल्ड पर रख दिया गया है। सुभाष चंद्रा कोई अकेला व्यक्ति नहीं है जिसे ऐसी सुविधा दी गई है। ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है जिनके मामले कौड़ियों में निपटा दिए गये जबकि देश के भीतर अगर किसान या गरीब आदमी पांच सौ रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है तो उसकी जमीन, घर नीलाम कर दिया जाता है। नौकरीपेशा व्यक्ति जिस महीने ईएमआई नहीं जमा कर पाता है तो बैंक के गुंडे उसके दरवाजे पर लात मारने लगते हैं। एक तरफ गरीब और सामान्य परिवार के बच्चों को एज्युकेशन लोन नहीं मिल पा रहा है वहीं मोदी सत्ता के चहेतों के लिए बैंक का पैसा निजी सम्पत्ति की तरह है जितनी मर्जी हो उतना लो और मर्जी हो तो चुकाओ मर्जी ना हो तो मत चुकाओ।

वीडियोकाॅन के चौसठ हज़ार आठ सौ अडतीस करोड़ का सेटलमेंट सिर्फ दो हज़ार नौ सौ बासठ करोड़ में कर दिया गया। रुचि सोया जिसे रामदेव यादव ने खरीदा उसके बारह हज़ार करोड़ का सेटलमेंट सिर्फ चार हज़ार दो सौ पैंतीस करोड़ में किया गया। मजेदार बात है कि रुचि सोया को खरीदने के लिए रामदेव यादव ने नब्बे फीसदी लोन बैंक से लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खासमखास कहे जाने वाले अड़ानी की कंपनियों की लंबी लिस्ट है जिनका सेटलमेंट औने-पौने दाम में कर दिया गया। अड़ानी पावर ने जब एस्सार पावर एम पी लिमिटेड को खरीदा तो बारह हज़ार तैंतालीस करोड़ का मामला सिर्फ दो हज़ार पांच सौ करोड़ में निपटा दिया गया। इसी तरह अड़ानी पावर ने जब लैंको अमरकंटक पावर खरीदा तो उसे भी 15190 करोड़ के एवज में 4101 करोड़ में निपटा दिया गया। जब अड़ानी पावर ने कोरबा वेस्ट पावर कंपनी खरीदी तो उसे पांच हज़ार बत्तीस करोड़ की जगह दो हज़ार नौ सौ करोड़ ही देने पड़े।

एचडीआईएल (बांद्रा कुर्ला) 7795 करोड़ की जगह सिर्फ 285 करोड़ देने पर अडानी प्रापर्टीज का हो गया। नेशनल रायल कार्पोरेशन 1175 करोड़ की जगह 160 करोड़ में अडानी प्रापर्टीज को दे दिया गया। आदित्य स्टेट्स भी अडानी प्रापर्टीज ने 593 करोड़ की जगह 265 करोड़ देकर ले लिया। गौतम अड़ानी ने गुड होम्स बनाने के लिए 17 सौ करोड़ का कर्ज लिया लेकिन सारे खेल का अंत मात्र 76 करोड़ में कर दिया गया। यानी अडानी की सारी कंपनियों को 61000 करोड़ से अधिक चुकाना था लेकिन चुकाया गया सिर्फ 15977 करोड़ और दि एंड हो गया। जिओन स्टील पर लोन था 5367 करोड़ का निपटारा हो गया सिर्फ 15 करोड़ में। लैंको इन्फ्रा ने 3331 करोड़ की जगह चुकाए 136 करोड़। अलोक इंडस्ट्रीज को 29500 करोड़ के एवज में देने पड़े 5000 करोड़। इसी तरह से इलेक्ट्रोस्टी स्टील को 13000 करोड़ की जगह देने पड़े 5320 करोड़। मोनेट इस्पात ने भी दिए सिर्फ 900 करोड़ 11500 करोड़ की जगह। भूषण इंडस्ट्रीज 56 हज़ार करोड़ मिले 35 हज़ार करोड़, ज्योति स्ट्रक्चर 7360 करोड़ वापस आए 3690 करोड़।

ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी सरकार को नहीं होती। इस हेयरकट की पूरी रिपोर्ट आरबीआई और नीति आयोग को भेजी जाती है। इसे पार्लियामेंट के पटल पर भी रखा जाता है। लेकिन सरकार अपनी मस्ती में मस्त रहती है। इसे ऐसा समझें। मार्च 2026 की रिपोर्ट बताती है कि तेरह लाख पांच हजार करोड़ पर रिकवरी हुई सिर्फ तीन हज़ार दो सौ करोड़ की। सितम्बर 2025 में 12 लाख 31 हजार करोड़ में आये थे मात्र 99 हजार करोड़। आरबीआई नोट छापता है और सरकार रिटर्न आफ करती है। देश के पांंच बड़े बैंकों का 10 वर्ष में लगभग 9 लाख 80 हज़ार करोड़ वापस नहीं आया। अगर इसे आठ बड़े बैंकों के हिसाब से देखें तो यह आंकड़ा तेरह लाख करोड़ को पार कर जाता है। यानी मोदी गवर्नमेंट ने लाखों करोड़ों रुपयों को दुअन्नी – चवन्नी बनाकर रख दिया है।

देश के अंदर फाइनेंशियली और नेक्सेस सिस्टम के आसरे सब कुछ चंद हाथों में सिमटता चला गया। मौजूदा वक्त की एक हकीकत यह भी है कि देश का कोई भी कार्पोरेट, कोई भी बड़ा बिजनेसमैन बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों (एनडीए) से हटकर किसी भी विपक्षी पार्टी को पालिटिकल फंडिंग कर पाने की स्थिति में नहीं है। जो सत्ता के साथ खड़ा है उसके लिए कोई नियम कायदा कानून मायने नहीं रखता है। यानी सारे नियम कायदे कानून गायब हो गये हैं। इस दौर में पूरी की पूरी पालिटिक्स उस फाइनेंशियल सिस्टम पर जाकर खड़ी हो गई है जिस फाइनेंशियल सिस्टम को अपनी हथेली में दबोच कर मौजूदा राजनीतिक सत्ता मदमस्त हो चली है।

नरेन्द्र मोदी आज प्रधानमंत्री हैं तय है कल नहीं रहेंगे लेकिन देश आज भी है और कल भी रहेगा। तो जो भी नया व्यक्ति सत्ता सम्हालेगा उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वो या तो देश में एक झटके में सब कुछ नेशनलाइज कर दे यानी ऐलान कर दे कि हर प्राइवेट कंपनी अब सरकारी कंपनी है और सभी की पूंजी देश की पूंजी है या फिर वह निकल पड़े एक ऐसे मिशन पर जिस मिशन को पूरा करने से पहले ही उसकी गद्दी चली जाए। जिस तरह से श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में नेशनलाइजेशन किया था उसी तरीके से नरेन्द्र मोदी के बाद सत्ता सम्हालने वाले को नेशनलाइजेशन करना ही पड़ेगा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को एक बार फिर से उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है। अन्यथा चंद हाथों में भटकते हुए देश की राजनीति और राजनीति करने वाले नेताओं को कार्पोरेट अपने हिसाब से नचाने लगेंगे। अब जब जं जी, जं अल्फा और युवा जिसके पास गवांने के लिए कुछ भी नहीं है वह इस हकीकत को समझ कर देश की आवाज बनने लगा है तो क्या मौजूदा राजनीतिक सत्ता (मोदी गवर्नमेंट) जाते जाते सब कुछ समेट कर ले जाना चाहती है ?

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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